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Rigveda Mandal 3 / Sukta 32 / Mantra 13

62 Sukta
17 Mantra
3/32/13
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
य॒ज्ञेनेन्द्र॒मव॒सा च॑क्रे अ॒र्वागैनं॑ सु॒म्नाय॒ नव्य॑से ववृत्याम्। यः स्तोमे॑भिर्वावृ॒धे पू॒र्व्येभि॒र्यो म॑ध्य॒मेभि॑रु॒त नूत॑नेभिः॥

य॒ज्ञेन॑ । इन्द्र॑म् । अव॑सा । आ । च॒क्रे॒ । अ॒र्वाक् । आ । ए॒न॒म् । सु॒म्नाय॑ । नव्य॑से । व॒वृ॒त्या॒म् । यः । स्तोमे॑भिः । व॒वृ॒धे । पू॒र्व्येभिः॑ । यः । म॒ध्य॒मेभिः॑ । उ॒त । नूत॑नेभिः ॥

Mantra without Swara
यज्ञेनेन्द्रमवसा चक्रे अर्वागैनं सुम्नाय नव्यसे ववृत्याम्। यः स्तोमेभिर्वावृधे पूर्व्येभिर्यो मध्यमेभिरुत नूतनेभिः॥

यज्ञेन। इन्द्रम्। अवसा। आ। चक्रे। अर्वाक्। आ। एनम्। सुम्नाय। नव्यसे। ववृत्याम्। यः। स्तोमेभिः। ववृधे। पूर्व्येभिः। यः। मध्यमेभिः। उत। नूतनेभिः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 11 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे मैं (यः) जो (पूर्व्येभिः) प्राचीनों में कुशल और (मध्यमेभिः) बीच में हुए (उत) और भी (नूतनेभिः) नवीन (स्तोमेभिः) प्रशंसायुक्त कर्मों से (वावृधे) बढ़ता है (यः) जो (नव्यसे) नवीन (सुम्नाय) सुख के लिये (यज्ञेन) युक्त व्यवहार (अवसा) रक्षा आदि से (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्य्य को (आचक्रे) अच्छा करता है (अर्वाक्) पीछे (एनम्) इसकी रक्षा करता है उसके समीप (आ) (ववृत्याम्) प्राप्त होऊँ, वैसे आप लोग भी इस कर्म को करें ॥१३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य व्यतीत हुए व्यवहार के शेष मर्म को जानने मध्यम पुरुषों की रक्षा करने और नवीन प्रयत्न से वृद्धि को प्राप्त होते हैं, वे लोग उसके अनन्तर नवीन-नवीन सुख को प्राप्त होने योग्य होते हैं न कि अन्य आलस्ययुक्त और मूर्ख पुरुष ॥१३॥
Subject
अब कैसे मनुष्य सुख को प्राप्त हो सकते, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।