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Rigveda Mandal 3 / Sukta 32 / Mantra 11

62 Sukta
17 Mantra
3/32/11
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अह॒न्नहिं॑ परि॒शया॑न॒मर्ण॑ ओजा॒यमा॑नं तुविजात॒ तव्या॑न्। न ते॑ महि॒त्वमनु॑ भू॒दध॒ द्यौर्यद॒न्यया॑ स्फि॒ग्या॒३॒॑ क्षामव॑स्थाः॥

अह॒न् । अहि॑म् । प॒रि॒ऽशया॑नम् । अर्णः॑ । ओ॒जा॒यमा॑नम् । तु॒वि॒ऽजा॒त॒ । तव्या॑न् । न । ते॒ । म॒हि॒ऽत्वम् । अनु॑ । भू॒त् । अध॑ । द्यौः । यत् । अ॒न्यया॑ । स्फि॒ग्या॑ । क्षाम् । अव॑स्थाः ॥

Mantra without Swara
अहन्नहिं परिशयानमर्ण ओजायमानं तुविजात तव्यान्। न ते महित्वमनु भूदध द्यौर्यदन्यया स्फिग्या३ क्षामवस्थाः॥

अहन्। अहिम्। परिऽशयानम्। अर्णः। ओजायमानम्। तुविऽजात। तव्यान्। न। ते। महिऽत्वम्। अनु। भूत्। अध। द्यौः। यत्। अन्यया। स्फिग्या। क्षाम्। अवस्थाः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 11 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (तुविजात) बहुत लोगों में प्रसिद्ध (तव्यान्) अत्यन्त बलयुक्त ! (यत्) जो आप जैसे (द्यौः) सूर्य प्रकाश (ओजायमानम्) बल को प्राप्त होते हुए (परिशयानम्) सब ओर से आकाश में सोते जैसे वर्त्तमान (अहिम्) मेघ को (अहन्) नाश करता है (अर्णः) जल को गिराता है और जैसे सूर्य्य का (महित्वम्) बड़ापन (अनु) (भूत्) हो वा जैसे यह मेघ (अध) तदनन्तर (अन्यया) दूसरी (स्फिग्या) मध्य के अवयवरूप से (क्षाम्) पृथिवी को ढापता है, वैसे आप शत्रुओं को (अवस्थाः) घेर के वर्त्तमान हूजिये जिससे (ते) वे आपकी महिमा को (न) नहीं काटैं ॥११॥
Essence
हे राजपुरुषो ! जैसे सूर्य्य अन्तरिक्ष में वर्त्तमान बलवान् मेघ का नाश और भूमि में गिरा कर उसके जल से प्राणियों का पोषण करता है, वैसे ही अधर्म में वर्त्तमान शत्रु का नाश करके उसके ऐश्वर्य्य से राज्य का पालन करो ॥११॥
Subject
फिर राजपुरुष क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।