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Rigveda Mandal 3 / Sukta 32 / Mantra 10

62 Sukta
17 Mantra
3/32/10
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वं स॒द्यो अ॑पिबो जा॒त इ॑न्द्र॒ मदा॑य॒ सोमं॑ पर॒मे व्यो॑मन्। यद्ध॒ द्यावा॑पृथि॒वी आवि॑वेशी॒रथा॑भवः पू॒र्व्यः का॒रुधा॑याः॥

त्वम् । स॒द्यः । अ॒पि॒बः॒ । ज॒तः । इ॒न्द्र॒ । मदा॑य । सोम॑म् । प॒र॒मे । विऽओ॑मन् । यत् । ह॒ । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । आ । अवि॑वेशीः । अथ॑ । अ॒भ॒वः॒ । पू॒र्व्यः । का॒रुऽधा॑याः ॥

Mantra without Swara
त्वं सद्यो अपिबो जात इन्द्र मदाय सोमं परमे व्योमन्। यद्ध द्यावापृथिवी आविवेशीरथाभवः पूर्व्यः कारुधायाः॥

त्वम्। सद्यः। अपिबः। जातः। इन्द्र। मदाय। सोमम्। परमे। विऽओमन्। यत्। ह। द्यावापृथिवी इति। आ। अविवेशीः। अथ। अभवः। पूर्व्यः। कारुऽधायाः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 10 Mantra » 5

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Meaning
हे (इन्द्र) इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव ! (त्वम्) आप (परमे) उत्तम (व्योमन्) आकाशवत् व्यापक आत्मज्ञान में (सद्यः) शीघ्र (जातः) प्रकट वा प्रसिद्ध हुए (मदाय) आनन्द के लिये (सोमम्) बल और बुद्धि के बढ़ानेवाले रस को (अपिबः) पीते हैं (अथ) इसके अनन्तर (यत्) जो (पूर्व्यः) पूर्व लोगों में श्रेष्ठ (कारुधायाः) शिल्पी जनों का धारणकर्त्ता (अभवः) हो वह आप (ह) निश्चय से (द्यावापृथिवी) प्रकाश और भूमि में (आ) सब ओर से (आविवेशीः) बारम्बार प्रवेश कीजिये ॥१०॥
Essence
हे मनुष्यो ! ब्रह्मचर्य्य से शीघ्र विद्वान् और नियमित आहार-विहार से रोगरहित हो के परमात्मा की आराधना करते हुए सृष्टि और पदार्थविद्याओं में आप सब प्रवेश करें, जिससे जन्म की सफलता हो ॥१०॥
Subject
जिस प्रकार जन्म की सफलता हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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