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Rigveda Mandal 3 / Sukta 31 / Mantra 8

62 Sukta
22 Mantra
3/31/8
Devata- इन्द्र: Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः, ऐषीरथीः कुशिको वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒तःस॑तः प्रति॒मानं॑ पुरो॒भूर्विश्वा॑ वेद॒ जनि॑मा॒ हन्ति॒ शुष्ण॑म्। प्र णो॑ दि॒वः प॑द॒वीर्ग॒व्युरर्च॒न्त्सखा॒ सखीँ॑रमुञ्च॒न्निर॑व॒द्यात्॥

स॒तःऽस॑तः । प्र॒ति॒ऽमान॑म् । पु॒रः॒ऽभूः । विश्वा॑ । वे॒द॒ । जनि॑म । हन्ति॑ । शुष्ण॑म् । प्र । नः॒ । दि॒वः । प॒द॒ऽवीः । ग॒व्युः । अर्च॑न् । सखा॑ । सखी॑न् । अ॒मु॒ञ्च॒त् । निः । अ॒व॒द्यात् ॥

Mantra without Swara
सतःसतः प्रतिमानं पुरोभूर्विश्वा वेद जनिमा हन्ति शुष्णम्। प्र णो दिवः पदवीर्गव्युरर्चन्त्सखा सखीँरमुञ्चन्निरवद्यात्॥

सतःऽसतः। प्रतिऽमानम्। पुरःऽभूः। विश्वा। वेद। जनिम। हन्ति। शुष्णम्। प्र। नः। दिवः। पदऽवीः। गव्युः। अर्चन्। सखा। सखीन्। अमुञ्चत्। निः। अवद्यात्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 6 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो पुरुष (पुरोभूः) पहिले से चिताता (सतःसतः) विद्यमान विद्यमान के (प्रतिमानम्) परिमाण के साधक को वा (विश्वा) संपूर्ण (जनिमा) उत्पन्न हुए पदार्थों को (वेद) जानता और (शुष्णम्) शोककारक दुःख को (हन्ति) नाश करता है वह (गव्युः) अपने को विद्या चाहनेवाला (नः) हम लोगों के (दिवः) प्रकाश की (पदवीः) प्रतिष्ठाओं को (प्र) प्राप्त करे (सखीन्) मित्रों का (अर्चन्) सत्कार करता हुआ (सखा) मित्र होकर (अवद्यात्) धर्मरहित आवरण से (निः) निरन्तर (अमुञ्चत्) पृथक् करे वह अत्यन्त सुख को प्राप्त हो ॥८॥
Essence
वे ही मनुष्य सुखी होते हैं, जो कार्य्यकारणरूप सृष्टि को जान और संपूर्ण जनों के मित्र हो सम्पूर्ण जनों को पाप के आचरण से पृथक् करके धर्म के आचरण में प्रवृत्त करें, वे ही सत्य मित्र हैं ॥८॥
Subject
फिर कौन सुखी होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।