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Rigveda Mandal 3 / Sukta 31 / Mantra 7

62 Sukta
22 Mantra
3/31/7
Devata- इन्द्र: Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः, ऐषीरथीः कुशिको वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अग॑च्छदु॒ विप्र॑तमः सखी॒यन्नसू॑दयत्सु॒कृते॒ गर्भ॒मद्रिः॑। स॒सान॒ मर्यो॒ युव॑भिर्मख॒स्यन्नथा॑भव॒दङ्गि॑राः स॒द्यो अर्च॑न्॥

अग॑च्छत् । ऊँ॒ इति॑ । विप्र॑ऽतमः । स॒खि॒ऽयन् । असू॑दयत् । सु॒ऽकृते॑ । गर्भ॑म् । अद्रिः॑ । स॒सान॑ । मर्यः॑ । युव॑ऽभिः । म॒ख॒स्यन् । अथ॑ । अ॒भ॒व॒त् । अङ्गि॑राः । स॒द्यः । अर्च॑न् ॥

Mantra without Swara
अगच्छदु विप्रतमः सखीयन्नसूदयत्सुकृते गर्भमद्रिः। ससान मर्यो युवभिर्मखस्यन्नथाभवदङ्गिराः सद्यो अर्चन्॥

अगच्छत्। ऊँ इति। विप्रऽतमः। सखिऽयन्। असूदयत्। सुऽकृते। गर्भम्। अद्रिः। ससान। मर्यः। युवऽभिः। मखस्यन्। अथ। अभवत्। अङ्गिराः। सद्यः। अर्चन्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 6 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
जो (मर्य्यः) मनुष्य (युवभिः) युवावस्थापन्न पुरुषों के सहित वर्त्तमान (सखीयन्) मित्र को चाहता वा (मखस्यन्) आत्मसम्बन्धी यज्ञ करने की इच्छा करता हुआ (अथ) उसके अनन्तर (अङ्गिराः) शरीरों में रस के सदृश वर्त्तमान (सद्यः) शीघ्र (अर्चन्) सत्कार करता हुआ (विप्रतमः) अत्यन्त बुद्धिमान् पुरुष उस स्त्री के समीप (अगच्छत्) प्राप्त होवे वह पुरुष (अद्रिः) मेघ जैसे (गर्भम्) गर्भ को वैसे (सुकृते) उत्तम कर्म के करने में उद्यत (अभवत्) होवे तथा सत्यासत्य का (ससान) विभाग करता है (उ) और भी निकृष्ट कर्म को (असूदयत्) नाश करे ॥७॥
Essence
जो ब्रह्मचर्य्य से विद्या और उत्तम शिक्षा को ग्रहण करके युवा पुरुष अपने तुल्य कन्या के साथ सुहृद्भाव और प्रीति को प्राप्त हो के उसको सत्कार करता हुआ विवाहै, वह पुरुष जैसे मेघ से संसार सुख को प्राप्त होता है, वैसे सुख को प्राप्त होवे ॥७॥
Subject
फिर कौन पुरुष सुख देनेवाला होता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।