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Rigveda Mandal 3 / Sukta 31 / Mantra 5

62 Sukta
22 Mantra
3/31/5
Devata- इन्द्र: Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः, ऐषीरथीः कुशिको वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वी॒ळौ स॒तीर॒भि धीरा॑ अतृन्दन्प्रा॒चाहि॑न्व॒न्मन॑सा स॒प्त विप्राः॑। विश्वा॑मविन्दन्प॒थ्या॑मृ॒तस्य॑ प्रजा॒नन्नित्ता नम॒सा वि॑वेश॥

वी॒ळौ । स॒तीः । अ॒भि । धीराः॑ । अ॒तृ॒न्द॒न् । प्रा॒चा । अ॒हि॒न्व॒न् । मन॑सा । स॒प्त । विप्राः॑ । विश्वा॑म् । अ॒वि॒न्द॒न् । प॒थ्या॑म् । ऋ॒तस्य॑ । प्र॒ऽजा॒नन् । इत् । ता । न॒म॒सा । वि॒वे॒श॒ ॥

Mantra without Swara
वीळौ सतीरभि धीरा अतृन्दन्प्राचाहिन्वन्मनसा सप्त विप्राः। विश्वामविन्दन्पथ्यामृतस्य प्रजानन्नित्ता नमसा विवेश॥

वीळौ। सतीः। अभि। धीराः। अतृन्दन्। प्राचा। अहिन्वन्। मनसा। सप्त। विप्राः। विश्वाम्। अविन्दन्। पथ्याम्। ऋतस्य। प्रऽजानन्। इत्। ता। नमसा। विवेश॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 5 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (धीराः) उत्तम विचारयुक्त (विप्राः) बुद्धिमान् लोग (प्राचा) प्राचीन (मनसा) अन्तःकरण से (सप्त) पाँच प्राण बुद्धि और मन तथा (सतीः) वर्त्तमान प्रकृतियों को (अभि) (अहिन्वन्) बढ़ाते हैं और मिथ्या का (अतृन्दन्) नाश करें तथा (ऋतस्य) सत्य के (वीळौ) प्रशंसनीय बल में (विश्वाम्) सम्पूर्ण (पथ्याम्) मर्य्यादा के योग्य क्रिया को (अविन्दन्) प्राप्त होते हैं वैसे आप (ताः) उनको (नमसा) स्तुति से (प्रजानन्) जानते हुए (इत्) ही (आ) (विवेश) शुभ कर्म में प्रवेश कीजिये ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे युक्ति से सेवन किये हुए प्राण और अन्तःकरण दुःख के त्याग और सुख के लाभ के लिये समर्थ होते हैं, वैसे ही विद्वानों के सङ्ग आदि कर्म दुःखों को निवृत्त कराके सुखों को उत्पन्न कराते हैं ॥५॥
Subject
अब विद्वान् के सङ्ग से क्या होता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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