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Rigveda Mandal 3 / Sukta 31 / Mantra 22

62 Sukta
22 Mantra
3/31/22
Devata- इन्द्र: Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः, ऐषीरथीः कुशिको वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
शु॒नं हु॑वेम म॒घवा॑न॒मिन्द्र॑म॒स्मिन्भरे॒ नृत॑मं॒ वाज॑सातौ। शृ॒ण्वन्त॑मु॒ग्रमू॒तये॑ स॒मत्सु॒ घ्नन्तं॑ वृ॒त्राणि॑ सं॒जितं॒ धना॑नाम्॥

शु॒नम् । हु॒वे॒म॒ । म॒घवा॑नम् । इन्द्र॑म् । अ॒स्मिन् । भरे॑ । नृऽत॑मम् । वाज॑ऽसातौ । शृ॒ण्वन्त॑म् । उ॒ग्रम् । ऊ॒तये॑ । स॒मत्ऽसु॑ । घ्नन्त॑म् । वृ॒त्राणि॑ । स॒म्ऽजित॑म् । धना॑नाम् ॥

Mantra without Swara
शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन्भरे नृतमं वाजसातौ। शृण्वन्तमुग्रमूतये समत्सु घ्नन्तं वृत्राणि संजितं धनानाम्॥

शुनम्। हुवेम। मघवानम्। इन्द्रम्। अस्मिन्। भरे। नृऽतमम्। वाजऽसातौ। शृण्वन्तम्। उग्रम्। ऊतये। समत्ऽसु। घ्नन्तम्। वृत्राणि। सम्ऽजितम्। धनानाम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 8 Mantra » 7

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Meaning
हे वीर पुरुषो ! जैसे हम लोग (ऊतये) रक्षा आदि के लिये (वृत्राणि) मेघों के अवयवों को सूर्य्य के समान (अस्मिन्) इस वर्त्तमान (भरे) पुष्ट करने के योग्य (वाजसातौ) अन्न आदि के विभागकारक संग्राम में (धनानाम्) धनों के (सञ्जितम्) उत्तम प्रकार जीतनेवाले (नृतमम्) अतिप्रधान (समत्सु) संग्रामों में (घ्नन्तम्) नाश करते और (शृण्वन्तम्) सुनते हुए (उग्रम्) तेजस्वी (शुनम्) वृद्धिकर्त्ता (मघवानम्) अत्यन्त धन से युक्त (इन्द्रम्) शत्रुओं के विदारनेवाले का (हुवेम) स्वीकार वा प्रशंसा करें, वैसे इस पुरुष का आप लोग भी आह्वान करें ॥२२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। उन्हीं लोगों का निश्चय विजय होता है कि जिनके अत्यन्त धन बलयुक्त और सब वचनों के सुननेवाले श्रेष्ठ पुरुष जो कि संग्रामों में शत्रुओं के मारने जीतनेवाले हों ॥२२॥ इस मन्त्र में अग्नि, विद्वान्, राजा की सेना, मित्र, वाणी, उपदेशकर्त्ता और प्रजा के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह इक्तीसवाँ सूक्त और आठवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
अब कौन विजयी होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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