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Rigveda Mandal 3 / Sukta 31 / Mantra 21

62 Sukta
22 Mantra
3/31/21
Devata- इन्द्र: Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः, ऐषीरथीः कुशिको वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अदे॑दिष्ट वृत्र॒हा गोप॑ति॒र्गा अ॒न्तः कृ॒ष्णाँ अ॑रु॒षैर्धाम॑भिर्गात्। प्र सू॒नृता॑ दि॒शमा॑न ऋ॒तेन॒ दुर॑श्च॒ विश्वा॑ अवृणो॒दप॒ स्वाः॥

अदे॑दिष्ट । वृ॒त्र॒ऽहा । गोऽप॑तिः । गाः । अ॒न्तरिति॑ । कृ॒ष्णान् । अ॒रु॒षैः । धाम॑ऽभिः । गा॒त् । प्र । सू॒नृताः॑ । दि॒शमा॑नः । ऋ॒तेन॑ । दुरः॑ । च॒ । विश्वाः॑ । अ॒वृ॒णो॒त् । अप॑ । स्वाः ॥

Mantra without Swara
अदेदिष्ट वृत्रहा गोपतिर्गा अन्तः कृष्णाँ अरुषैर्धामभिर्गात्। प्र सूनृता दिशमान ऋतेन दुरश्च विश्वा अवृणोदप स्वाः॥

अदेदिष्ट। वृत्रऽहा। गोऽपतिः। गाः। अन्तरिति। कृष्णान्। अरुषैः। धामऽभिः। गात्। प्र। सूनृताः। दिशमानः। ऋतेन। दुरः। च। विश्वाः। अवृणोत्। अप। स्वाः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 8 Mantra » 6

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Meaning
हे विद्वान् पुरुष ! जैसे (वृत्रहा) मेघ का नाशक सूर्य्य अपनी किरणों से संसार की रक्षा करता है और जैसे (गोपतिः) गौओं का पालनकर्त्ता (गाः) गौओं की रक्षा करता तथा (अरुषैः) लाल गुण विशिष्ट घोड़ों और (धामभिः) स्थान विशेषों के साथ (कृष्णान्) काले वर्णों को (अन्तः) मध्य में (गात्) प्राप्त होवें (दुरः, च) और द्वारों को (अप, (अवृणोत्) खोलै वैसे (ऋतेन) सत्य के सदृश जल के सहित (विश्वाः) सम्पूर्ण (स्वाः) अपनी (सूनृताः) सत्य आदि लक्षणों से युक्त वाणियों के (प्र, दिशमानः) अच्छे प्रकार उपदेशक (अदेदिष्ट) आप अत्यन्त उपदेश कीजिये ॥२१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग सूर्य्य गौओं के पालक और पिता के सदृश सबकी रक्षा करते हैं, वे ही गुरुजन होने योग्य हैं ॥२१॥
Subject
अब कौन गुरु होने के योग्य हें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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