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Rigveda Mandal 3 / Sukta 31 / Mantra 20

62 Sukta
22 Mantra
3/31/20
Devata- इन्द्र: Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः, ऐषीरथीः कुशिको वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
मिहः॑ पाव॒काः प्रत॑ता अभूवन्त्स्व॒स्ति नः॑ पिपृहि पा॒रमा॑साम्। इन्द्र॒ त्वं र॑थि॒रः पा॑हि नो रि॒षो म॒क्षूम॑क्षू कृणुहि गो॒जितो॑ नः॥

मिहः॑ । पा॒व॒काः । प्रऽत॑ताः । अ॒भू॒व॒न् । स्व॒स्ति । नः॒ । पि॒पृ॒हि॒ । पा॒रम् । आ॒सा॒म् । इन्द्र॑ । त्वम् । र॒थि॒रः । पा॒हि॒ । नः॒ । रि॒षः । म॒क्षुऽम॑क्षु । कृ॒णु॒हि॒ । गो॒ऽजितः॑ । नः॒ ॥

Mantra without Swara
मिहः पावकाः प्रतता अभूवन्त्स्वस्ति नः पिपृहि पारमासाम्। इन्द्र त्वं रथिरः पाहि नो रिषो मक्षूमक्षू कृणुहि गोजितो नः॥

मिहः। पावकाः। प्रऽतताः। अभूवन्। स्वस्ति। नः। पिपृहि। पारम्। आसाम्। इन्द्र। त्वम्। रथिरः। पाहि। नः। रिषः। मक्षुऽमक्षु। कृणुहि। गोऽजितः। नः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 8 Mantra » 5

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Meaning
हे (इन्द्र) सूर्य्य के सदृश तेजस्वी राजन् ! (रथिरः) रथ आदि वस्तुओं से युक्त (त्वम्) आप (नः) हम लोगों की (रिषः) हिंसाकारक जन से (पाहि) रक्षा कीजिये (नः) हम लोगों को (गोजितः) पृथिवी के जीतनेवाले (मक्षूमक्षू) शीघ्र-शीघ्र (कृणुहि) करिये (आसाम्) इन शत्रुओं की सेनाओं के (पारम्) पार पहुँचाइये जो (मिहः) सींचनेवाले (प्रतताः) विस्तारस्वरूप और गुणों से युक्त (पावकाः) पवित्र और दूसरों को पवित्र करनेवाले (अभूवन्) होते हैं उन लोगों से (नः) हम लोगों के (स्वस्ति) सुख को (पिपृहि) पूरा कीजिये ॥२०॥
Essence
प्रजा और सेना के पुरुषों को चाहिये कि अपने प्रधान पुरुषों से इस प्रकार की याचना करें कि आप लोग हम लोगों से शत्रुओं को जीत-जीत कर सुख उत्पन्न करो। जैसे बिजुली आदि पदार्थ वृष्टि के द्वारा क्षुधा आदि दोष से दूर करके आनन्द देते हैं, वैसे ही हिंसा करनेवाले प्राणियों से शीघ्र दूर कर और रक्षा करके निरन्तर आनन्द दीजिये ॥२०॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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