Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 3 / Sukta 31 / Mantra 19

62 Sukta
22 Mantra
3/31/19
Devata- इन्द्र: Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः, ऐषीरथीः कुशिको वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तम॑ङ्गिर॒स्वन्नम॑सा सप॒र्यन्नव्यं॑ कृणोमि॒ सन्य॑से पुरा॒जाम्। द्रुहो॒ वि या॑हि बहु॒ला अदे॑वीः॒ स्व॑श्च नो मघवन्त्सा॒तये॑ धाः॥

तम् । अ॒ङ्गि॒र॒स्वत् । नम॑सा । स॒प॒र्यन् । नव्य॑म् । कृ॒णो॒मि॒ । सन्य॑से । पु॒रा॒ऽजाम् । द्रुहः॑ । वि । या॒हि॒ । ब॒हु॒लाः । अदे॑वीः । स्वरिति॑ स्वः॑ । च॒ । नः॒ । म॒घ॒ऽव॒न् । सा॒तये॑ । धाः॒ ॥

Mantra without Swara
तमङ्गिरस्वन्नमसा सपर्यन्नव्यं कृणोमि सन्यसे पुराजाम्। द्रुहो वि याहि बहुला अदेवीः स्वश्च नो मघवन्त्सातये धाः॥

तम्। अङ्गिरस्वत्। नमसा। सपर्यन्। नव्यम्। कृणोमि। सन्यसे। पुराऽजाम्। द्रुहः। वि। याहि। बहुलाः। अदेवीः। स्व१रिति स्वः। च। नः। मघऽवन्। सातये। धाः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 8 Mantra » 4

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (अङ्गिरस्वत्) विद्वानों के सहित विराजमान (मघवन्) श्रेष्ठ धनयुक्त राजन् ! (पुराजाम्) पहिले उत्पन्न और (नव्यम्) नवीन के सदृश वर्त्तमान (तम्) प्रथम कहे हुए आपकी मैं (सन्यसे) अलग-अलग बटे हुए पदार्थों में प्रयत्न करते हुए के लिये (नमसा) सत्कारपूर्वक (सपर्य्यन्) सेवा करता हुआ (कृणोमि) प्रसिद्ध करता हूँ आप (बहुलाः) बहुत (द्रुहः) शत्रुतायुक्त (अदेवीः) विद्यारहित स्त्रियों को (वि, याहि) दूर कीजिये (नः) हम लोगों के (सातये) संविभाग के लिये (स्वः, च) सुख को भी (धाः) धारण कीजिये ॥१९॥
Essence
प्रजारूप जनों को चाहिये कि न्याय विनय आदि शुभ गुणों से युक्त राजा आदि जनों का सदा ही सत्कार करें और राजा आदि पुरुषों को चाहिये कि प्रजाजनों का सदा पिता के तुल्य पालन करें और स्त्रियों को विद्यायुक्त करें, इससे अनेक प्रकार से सुख की वृद्धि करें ॥१९॥
Subject
फिर राजा और प्रजा के विषय को कहते हैं।