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Rigveda Mandal 3 / Sukta 31 / Mantra 17

62 Sukta
22 Mantra
3/31/17
Devata- इन्द्र: Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः, ऐषीरथीः कुशिको वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अनु॑ कृ॒ष्णे वसु॑धिती जिहाते उ॒भे सूर्य॑स्य मं॒हना॒ यज॑त्रे। परि॒ यत्ते॑ महि॒मानं॑ वृ॒जध्यै॒ सखा॑य इन्द्र॒ काम्या॑ ऋजि॒प्याः॥

अनु॑ । कृ॒ष्णे इति॑ । वसु॑धिती॒ इति॒ वसु॑ऽधिती । जि॒हा॒ते॒ इति॑ । उ॒भे इति॑ । सूर्य॑स्य । मं॒हना॑ । यज॑त्रे । परि॑ । यत् । ते॒ । म॒हि॒मान॑म् । वृ॒जध्यै॑ । सखा॑यः । इ॒न्द्र॒ । काम्याः॑ । ऋ॒जि॒प्याः ॥

Mantra without Swara
अनु कृष्णे वसुधिती जिहाते उभे सूर्यस्य मंहना यजत्रे। परि यत्ते महिमानं वृजध्यै सखाय इन्द्र काम्या ऋजिप्याः॥

अनु। कृष्णे इति। वसुधिती इति वसुऽधिती। जिहाते इति। उभे इति। सूर्यस्य। मंहना। यजत्रे। परि। यत्। ते। महिमानम्। वृजध्यै। सखायः। इन्द्र। काम्याः। ऋजिप्याः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 8 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त राजन् ! (यत्) जो (ते) आपके (काम्याः) कामना करने योग्य (ऋजिप्याः) सरल व्यवहारों के वर्द्धक (सखायः) मित्र हुए (महिमानम्) महिमा को (अनु) (कृष्णे) खींची गयी (उभे) दोनों (यजत्रे) परस्पर मिली हुई (वसुधिती) अन्तरिक्ष और पृथिवी (सूर्यस्य) सूर्य के (मंहना) महत्व से (वृजध्यै) रोकने को (परि) (जिहाते) प्राप्त होते से हैं उनको बढ़ाते हैं, वे आपसे सत्कार पाने योग्य हैं ॥१७॥
Essence
जैसे सूर्य अपने प्रताप से भूमि और प्रकाश का आकर्षण करके धारण करता है और जैसे भूमि तथा प्रकाश सम्पूर्ण पदार्थों को धारण करते हैं, वैसे उत्तम पुरुष को चाहिये कि महिमा को धारण और दुर्व्यसनों को त्याग करके मित्रों का सत्कार करें ॥१७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।