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Rigveda Mandal 3 / Sukta 31 / Mantra 11

62 Sukta
22 Mantra
3/31/11
Devata- इन्द्र: Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः, ऐषीरथीः कुशिको वा Chhanda- स्वराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स जा॒तेभि॑र्वृत्र॒हा सेदु॑ ह॒व्यैरुदु॒स्रिया॑ असृज॒दिन्द्रो॑ अ॒र्कैः। उ॒रू॒च्य॑स्मै घृ॒तव॒द्भर॑न्ती॒ मधु॒ स्वाद्म॑ दुदुहे॒ जेन्या॒ गौः॥

सः । जा॒तेभिः॑ । वृ॒त्र॒ऽहा । सः । इत् । ऊँ॒ इति॑ । ह॒व्यैः । उत् । उ॒स्रियाः॑ । अ॒सृ॒ज॒त् । इन्द्रः॑ । अ॒र्कैः । उ॒रू॒ची । अ॒स्मै॒ । घृ॒तऽव॑त् । भर॑न्ती । मधु॑ । स्वाद्म॑ । दु॒दु॒हे॒ । जेन्या॑ । गौः ॥

Mantra without Swara
स जातेभिर्वृत्रहा सेदु हव्यैरुदुस्रिया असृजदिन्द्रो अर्कैः। उरूच्यस्मै घृतवद्भरन्ती मधु स्वाद्म दुदुहे जेन्या गौः॥

सः। जातेभिः। वृत्रऽहा। सः। इत्। ऊँ इति। हव्यैः। उत्। उस्रियाः। असृजत्। इन्द्रः। अर्कैः। उरूची। अस्मै। घृतऽवत्। भरन्ती। मधु। स्वाद्म। दुदुहे। जेन्या। गौः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 7 Mantra » 1

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Meaning
जो (वृत्रहा) मेघ के नाशकर्त्ता सूर्य्य के सदृश (इन्द्रः) अतिश्रेष्ठ ऐश्वर्य्य का कारण (उस्रियाः) वाणियों को किरणों के सदृश (उत्, असृजत्) उत्पन्न करता है (अर्कैः) आदर करने योग्य मनुष्यों (हव्यैः) ग्रहण करने के योग्य पदार्थों और (जातेभिः) उत्पन्न हुए व्यवहारों के साथ पदार्थों को (असृजत्) उत्पन्न करता है (स, इत्) वही सुख को प्राप्त होता है जो (उरूची) बहुतों का सत्कार करती (घृतवत्) घृत वा जल उत्तमता युक्त (स्वाद्म) स्वादिष्ठ (मधु) मीठे गुण से युक्त पदार्थ को (भरन्ती) धारण करती हुई (जेन्या) जीतने योग्य (गौः) पृथिवी (अस्मै) उस ऐश्वर्य्य के लिये (दुदुहे) दुही जाती है उसको वह पुरुष (उ) ही जानै ॥११॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य अपने प्रकाश से सम्पूर्ण उत्पन्न हुए सृष्टि के पदार्थों का प्रकाश करता है, वैसे ही विद्वान् पुरुष विज्ञान से सम्पूर्ण पदार्थों को जानकर उसका सर्वत्र प्रकाश करें ॥११॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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