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Rigveda Mandal 3 / Sukta 31 / Mantra 10

62 Sukta
22 Mantra
3/31/10
Devata- इन्द्र: Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः, ऐषीरथीः कुशिको वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सं॒पश्य॑माना अमदन्न॒भि स्वं पयः॑ प्र॒त्नस्य॒ रेत॑सो॒ दुघा॑नाः। वि रोद॑सी अतप॒द्घोष॑ एषां जा॒ते निः॒ष्ठामद॑धु॒र्गोषु॑ वी॒रान्॥

स॒म्ऽपश्य॑मानाः । अ॒म॒द॒न् । अ॒भि । स्वम् । पयः॑ । प्र॒त्नस्य॑ । रेत॑सः । दुघा॑नाः । वि । रोद॑सी॒ इति॑ । अ॒त॒प॒त् । घोषः॑ । ए॒षा॒म् । जा॒ते । निः॒ऽस्थाम् । अद॑धुः । गोषु॑ । वी॒रान् ॥

Mantra without Swara
संपश्यमाना अमदन्नभि स्वं पयः प्रत्नस्य रेतसो दुघानाः। वि रोदसी अतपद्घोष एषां जाते निःष्ठामदधुर्गोषु वीरान्॥

सम्ऽपश्यमानाः। अमदन्। अभि। स्वम्। पयः। प्रत्नस्य। रेतसः। दुघानाः। वि। रोदसी इति। अतपत्। घोषः। एषाम्। जाते। निःऽस्थाम्। अदधुः। गोषु। वीरान्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 6 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
जो लोग (स्वम्) अपने को (संपश्यमानाः) उत्तम प्रकार देखते और (प्रत्नस्य) प्राचीन (रेतसः) वीर्य के (पयः) दुग्ध को (दुघानाः) पूर्ण करते हुए (अभि) सन्मुख (अमदन्) आनन्द करते हैं (एषाम्) इन (निःष्ठाम्) उत्तम प्रकार स्थित विद्वानों की (घोषः) वाणी सूर्य्य जैसे (रोदसी) अन्तरिक्ष पृथिवी को वैसे दुष्ट पुरुषों को (वि) (अतपत्) तपाती है वे पुरुष (जाते) उत्पन्न हुए इस संसार में (गोषु) पृथिवी आदिकों में (वीरान्) उत्तम गुणों से युक्त पुरुषों को (अदधुः) धारण किया करें ॥१०॥
Essence
जो उत्तम विचार करनेवाले धार्मिक विद्वान् पुरुष अपने अनादि काल सिद्ध सामर्थ्य को बढ़ावें, सब लोगों के लिये सत्य और असत्य का उपदेश कर दुष्टता को दूर कर और श्रेष्ठता का धारण करें, वे ही शूरवीर होते हैं, यह जानना चाहिये ॥१०॥
Subject
फिर विद्वान् लोग क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।