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Rigveda Mandal 3 / Sukta 31 / Mantra 1

62 Sukta
22 Mantra
3/31/1
Devata- इन्द्र: Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः, ऐषीरथीः कुशिको वा Chhanda- विराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
शास॒द्वह्नि॑र्दुहि॒तुर्न॒प्त्यं॑ गाद्वि॒द्वाँ ऋ॒तस्य॒ दीधि॑तिं सप॒र्यन्। पि॒ता यत्र॑ दुहि॒तुः सेक॑मृ॒ञ्जन्त्सं श॒ग्म्ये॑न॒ मन॑सा दध॒न्वे॥

शास॑त् । वह्निः॑ । दु॒हि॒तुः । न॒प्त्य॑म् । गा॒त् । वि॒द्वान् । ऋ॒तस्य॑ । दीधि॑तिम् । स॒प॒र्यन् । पि॒ता । यत्र॑ । दु॒हि॒तुः । सेक॑म् । ऋ॒ञ्जन् । सम् । श॒ग्म्ये॑न । मन॑सा । द॒ध॒न्वे ॥

Mantra without Swara
शासद्वह्निर्दुहितुर्नप्त्यं गाद्विद्वाँ ऋतस्य दीधितिं सपर्यन्। पिता यत्र दुहितुः सेकमृञ्जन्त्सं शग्म्येन मनसा दधन्वे॥

शासत्। वह्निः। दुहितुः। नप्त्यम्। गात्। विद्वान्। ऋतस्य। दीधितिम्। सपर्यन्। पिता। यत्र। दुहितुः। सेकम्। ऋञ्जन्। सम्। शग्म्येन। मनसा। दधन्वे॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 5 Mantra » 1

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Meaning
हे विद्वान् पुरुष ! (यत्र) जिस व्यवहार में (पिता) उत्पन्नकर्त्ता (वह्निः) वाहन करने अर्थात् व्यवहार में चलानेवाला (दुहितुः) कन्या के (सेकम्) सेचन को (ऋञ्जन्) सिद्ध करता हुआ (गात्) प्राप्त होवे उस व्यवहार में (विद्वान्) जानने योग्य व्यवहार का ज्ञाता (ऋतस्य) सत्य के (दीधितिम्) धारणकर्त्ता की (सपर्य्यन्) सेवा करता हुआ (दुहितुः) दूर में हितकारिणी कन्या के (नप्त्यम्) नाती में उत्पन्न हुए को (शासत्) शिक्षा देवे इससे (शग्म्येन) सुखों में वर्त्तमान (मनसा) अन्तःकरण से (सम्, दधन्वे) सम्यक् प्रसन्न होता है ॥१॥
Essence
हे मनुष्यो ! जैसे पिता के समीप से कन्या उत्पन्न होती है, वैसे ही सूर्य्य से प्रातःकाल की वेला प्रकट होती है और जैसे पति अपनी स्त्री में गर्भ को धारण करता है, वैसे कन्या के सदृश वर्त्तमान प्रातःकाल की वेला में सूर्य्य किरणरूप वीर्य्य को धारण करता है, उससे दिवसरूप पुत्र उत्पन्न होता है ॥१॥
Subject
अब तृतीय मण्डल में बाईस ऋचावाले ३१ वें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके पहिले मन्त्र में अग्नि के गुणों का विषय कहा है।

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