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Rigveda Mandal 3 / Sukta 30 / Mantra 9

62 Sukta
22 Mantra
3/30/9
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
नि सा॑म॒नामि॑षि॒रामि॑न्द्र॒ भूमिं॑ म॒हीम॑पा॒रां सद॑ने ससत्थ। अस्त॑भ्ना॒द्द्यां वृ॑ष॒भो अ॒न्तरि॑क्ष॒मर्ष॒न्त्वाप॒स्त्वये॒ह प्रसू॑ताः॥

नि । सा॒म॒नाम् । इ॒षि॒राम् । इ॒न्द्र॒ । भूमि॑म् । म॒हीम् । अ॒पा॒राम् । सद॑ने । स॒स॒त्थ॒ । अस्त॑भ्नात् । द्याम् । वृ॒ष॒भः । अ॒न्तरि॑क्षम् । अर्ष॑न्तु । आपः॑ । त्वया॑ । इ॒ह । प्रऽसू॑ताः ॥

Mantra without Swara
नि सामनामिषिरामिन्द्र भूमिं महीमपारां सदने ससत्थ। अस्तभ्नाद्द्यां वृषभो अन्तरिक्षमर्षन्त्वापस्त्वयेह प्रसूताः॥

नि। सामनाम्। इषिराम्। इन्द्र। भूमिम्। महीम्। अपाराम्। सदने। ससत्थ। अस्तभ्नात्। द्याम्। वृषभः। अन्तरिक्षम्। अर्षन्तु। आपः। त्वया। इह। प्रऽसूताः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 2 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) सूर्य के तुल्य प्रकाश से युक्त राजन् ! आप जैसे (वृषभः) वृष्टिकर्त्ता सूर्य (द्याम्) अन्तरिक्ष को (अस्तभ्नात्) पुष्टता से धारणकर्त्ता है वैसे (सामनाम्) उत्तम उपमाओं से युक्त (इषिराम्) बहुत पदार्थों की प्राप्ति करानेवाली (महीम्) बड़े परिमाण से युक्त (अपाराम्) जिसका पार नहीं (भूमिम्) जिसमें बहुत पदार्थ होते हैं उस भूमि को प्राप्त होकर (इह) इस (सदने) स्थान में (नि, ससत्थ) बैठो (त्वया) आपसे (प्रसूताः) प्रेरित हुए (आपः) जल (अन्तरिक्षम्) आकाश को (अर्षन्तु) प्राप्त होवें ॥९॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य नियमपूर्वक प्रकाश और भूमि को धारण करता है, वैसे ही न्याय से राजा राज्य को धारण करे और सब काल में प्रजाओं में ही बल बढ़ाया करे ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।