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Rigveda Mandal 3 / Sukta 30 / Mantra 8

62 Sukta
22 Mantra
3/30/8
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒हदा॑नुं पुरुहूत क्षि॒यन्त॑मह॒स्तमि॑न्द्र॒ सं पि॑ण॒क्कुणा॑रुम्। अ॒भि वृ॒त्रं वर्ध॑मानं॒ पिया॑रुम॒पाद॑मिन्द्र त॒वसा॑ जघन्थ॥

स॒हऽदा॑नुम् । पु॒रु॒ऽहू॒त॒ । क्षि॒यन्त॑म् । अ॒ह॒स्तम् । इ॒न्द्र॒ । सम् । पि॒ण॒क् । कुणा॑रुम् । अ॒भि । वृ॒त्रम् । वर्ध॑मानम् । पिया॑रुम् । अ॒पाद॑म् । इ॒न्द्र॒ । त॒वसा॑ । ज॒घ॒न्थ॒ ॥

Mantra without Swara
सहदानुं पुरुहूत क्षियन्तमहस्तमिन्द्र सं पिणक्कुणारुम्। अभि वृत्रं वर्धमानं पियारुमपादमिन्द्र तवसा जघन्थ॥

सहऽदानुम्। पुरुऽहूत। क्षियन्तम्। अहस्तम्। इन्द्र। सम्। पिणक्। कुणारुम्। अभि। वृत्रम्। वर्धमानम्। पियारुम्। अपादम्। इन्द्र। तवसा। जघन्थ॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 2 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (पुरुहूत) बहुत जनों से प्रशंसित अर्थात् यश को प्राप्त (इन्द्र) सूर्य्य के सदृश तेजस्वी ! जैसे (सहदानुम्) दान से युक्त (क्षियन्तम्) रहते हुए (अहस्तम्) अविद्यमान (कुणारुम्) शब्द करते और (वर्द्धमानम्) बढ़ते हुए (पियारुम्) पिये गये (अपादम्) पादों से हीन (वृत्रम्) मेघ को (अभि) सन्मुख पीसता है, वैसे शत्रुओं का आप (सम्, (पिणक्) नाश करो और (इन्द्र) हे दुष्टों को विदीर्ण करनेवाले आप (तवसा) बल से दुष्ट पुरुषों का (जघन्थ) नाश करें ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य मेघों के आकर्षण और वर्षाने से सम्पूर्ण जगत् को पालता है, वैसे ही दुष्टों के नाश करने और श्रेष्ठ पुरुषों के धारण करने से राजा को सम्पूर्ण प्रजाओं की पालना करनी चाहिये ॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।