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Rigveda Mandal 3 / Sukta 30 / Mantra 7

62 Sukta
22 Mantra
3/30/7
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
यस्मै॒ धायु॒रद॑धा॒ मर्त्या॒याभ॑क्तं चिद्भजते गे॒ह्यं१॒॑ सः। भ॒द्रा त॑ इन्द्र सुम॒तिर्घृ॒ताची॑ स॒हस्र॑दाना पुरुहूत रा॒तिः॥

यस्मै॑ । धायुः॑ । अद॑धाः । मर्त्या॑य । अभ॑क्तम् । चि॒त् । भ॒ज॒ते॒ । गे॒ह्य॑म् । सः । भ॒द्रा । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । सु॒ऽम॒तिः । घृ॒ताची॑ । स॒हस्र॑ऽदाना । पु॒रु॒ऽहू॒त॒ । रा॒तिः ॥

Mantra without Swara
यस्मै धायुरदधा मर्त्यायाभक्तं चिद्भजते गेह्यं१ सः। भद्रा त इन्द्र सुमतिर्घृताची सहस्रदाना पुरुहूत रातिः॥

यस्मै। धायुः। अदधाः। मर्त्याय। अभक्तम्। चित्। भजते। गेह्यम्। सः। भद्रा। ते। इन्द्र। सुऽमतिः। घृताची। सहस्रऽदाना। पुरुऽहूत। रातिः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 2 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
(पुरुहूत) (इन्द्र) सुख के दाता आप (यस्मै) जिस (मर्त्याय) मनुष्य के लिये (अभक्तम्) विभाग से रहित (गेह्यम्) गृह गृह में उत्पन्न हुए धन की (भजते) सेवा करते हैं जिसके लिये (धायुः) उत्तम पदार्थों के धारणकर्त्ता (चित्) भी आप सुख को (अदधाः) धारण करें उन (ते) आपकी जो (घृताची) सुख देनेवाली रात्रि के सदृश (भद्रा) कल्याण करनेवाली (सुमतिः) उत्तम बुद्धि और (सहस्रदाना) अनगिनती दान जिसमें दिये जाते हों ऐसी (रातिः) दान सम्बन्धिनी क्रिया है उसको (सः) वह स्वीकार करें ॥७॥
Essence
जो मनुष्य पिता और पितामह का धन आदि जो कि नहीं बटा हुआ, उसकी रक्षा वा सेवा करें और परस्पर दोषों को त्याग के गुणों का ग्रहण करें, वे कल्याण के भागी होवें ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।