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Rigveda Mandal 3 / Sukta 30 / Mantra 6

62 Sukta
22 Mantra
3/30/6
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र सू त॑ इन्द्र प्र॒वता॒ हरि॑भ्यां॒ प्र ते॒ वज्रः॑ प्रमृ॒णन्ने॑तु॒ शत्रू॑न्। ज॒हि प्र॑ती॒चो अ॑नू॒चः परा॑चो॒ विश्वं॑ स॒त्यं कृ॑णुहि वि॒ष्टम॑स्तु॥

प्र । सु । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । प्र॒ऽवता॑ । हरि॑ऽभ्याम् । प्र । ते॒ । वज्रः॑ । प्र॒ऽमृ॒णन् । ए॒तु॒ । शत्रू॑न् । ज॒हि । प्र॒ती॒चः । अ॒नू॒चः । परा॑चः । विश्व॑म् । स॒त्यम् । कृ॒णु॒हि॒ । वि॒ष्टम् । अ॒स्तु॒ ॥

Mantra without Swara
प्र सू त इन्द्र प्रवता हरिभ्यां प्र ते वज्रः प्रमृणन्नेतु शत्रून्। जहि प्रतीचो अनूचः पराचो विश्वं सत्यं कृणुहि विष्टमस्तु॥

प्र। सु। ते। इन्द्र। प्रऽवता। हरिऽभ्याम्। प्र। ते। वज्रः। प्रऽमृणन्। एतु। शत्रून्। जहि। प्रतीचः। अनूचः। पराचः। विश्वम्। सत्यम्। कृणुहि। विष्टम्। अस्तु॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 2 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) सूर्य के सदृश प्रकाशमान ! (हरिभ्याम्) उत्तम प्रकार शिक्षायुक्त घोड़ों से युक्त रथ में (प्रवता) उत्तम मार्ग से आप जैसे (वज्रः) किरणों के सदृश शस्त्रों का समूह और (शत्रून्) दुष्ट कर्म करनेवालों को (प्रमृणन्) अत्यन्त नाश करते हुए (प्र, एतु) प्राप्त हूजिये इस प्रकार (ते) आपका विजय होता है आप (प्रतीचः) पीछे वर्त्तमान (अनूचः) और कपट से अनुकूल अर्थात् (पराचः) दूर स्थल में विराजमान शत्रुओं की (प्र) (जहि) हिंसा करो तथा (विश्वम्) संपूर्ण (सत्यम्) सत्य को (सुकृणुहि) अच्छे प्रकार बढ़ाओ जिससे वह (विष्टम्) व्याप्त (अस्तु) हो ॥६॥
Essence
जो मनुष्य दुष्ट आचरण करनेवाले मनुष्य आदि प्राणियों का निवारण करके सत्य का प्रचार करें, वे सुख से आनन्द भोगते हैं ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।