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Rigveda Mandal 3 / Sukta 30 / Mantra 5

62 Sukta
22 Mantra
3/30/5
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒ताभ॑ये पुरुहूत॒ श्रवो॑भि॒रेको॑ दृ॒ळ्हम॑वदो वृत्र॒हा सन्। इ॒मे चि॑दिन्द्र॒ रोद॑सी अपा॒रे यत्सं॑गृ॒भ्णा म॑घवन्का॒शिरित्ते॑॥

उ॒त । अभ॑ये । पु॒रु॒ऽहू॒त॒ । श्रवः॑ऽभिः । एकः॑ । दृ॒ळ्हम् । अ॒व॒दः॒ । वृ॒त्र॒ऽहा । सन् । इ॒मे । चि॒त् । इ॒न्द्र॒ । रोद॑सी॒ इति॑ । अ॒पा॒रे इति॑ । यत् । स॒म्ऽगृ॒भ्णाः । म॒घ॒व॒न् । का॒शिः । इत् । ते॒ ॥

Mantra without Swara
उताभये पुरुहूत श्रवोभिरेको दृळ्हमवदो वृत्रहा सन्। इमे चिदिन्द्र रोदसी अपारे यत्संगृभ्णा मघवन्काशिरित्ते॥

उत। अभये। पुरुऽहूत। श्रवःऽभिः। एकः। दृळ्हम्। अवदः। वृत्रऽहा। सन्। इमे। चित्। इन्द्र। रोदसी इति। अपारे इति। यत्। सम्ऽगृभ्णाः। मघवन्। काशिः। इत्। ते॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 1 Mantra » 5

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Meaning
हे (पुरुहूत) बहुत जनों से प्रशंसित (मघवन्) बहुत धन से युक्त (इन्द्र) सूर्य्य के तुल्य प्रकाशमान ! आप (एकः) विना सहाय स्वयं बलवान् (सन्) हुए (अभये) भय से रहित व्यवहार में (श्रवोभिः) अनेक प्रकार के सुनने योग्य वचनों के सहित (दृढम्) निश्चय (अवदः) बोलें (उत) और भी जैसे (वृत्रहा) सूर्य्य (चित्) भी (इमे) इन (अपारे) अवधिरहित (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को प्राप्त होता है वैसे होकर (यत्) जो (ते) आपके (काशिः) न्याय विनय आदि उत्तम गुणों का प्रकाश है उसको (इत्) ही (सङ्गृभ्णाः) ग्रहण करें ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजा के पुरुषों को चाहिये कि अनेक प्रकार के उपायों से प्रजाओं में उपद्रवों से भय का नाश और सूर्य के तुल्य न्यायविद्या का प्रकाश करें ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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