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Rigveda Mandal 3 / Sukta 30 / Mantra 4

62 Sukta
22 Mantra
3/30/4
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वं हि ष्मा॑ च्या॒वय॒न्नच्यु॑ता॒न्येको॑ वृ॒त्रा चर॑सि॒ जिघ्न॑मानः। तव॒ द्यावा॑पृथि॒वी पर्व॑ता॒सोऽनु॑ व्र॒ताय॒ निमि॑तेव तस्थुः॥

त्वम् । हि । स्म॒ । च्या॒वय॑न् । अच्यु॑तानि । एकः॑ । वृ॒त्रा । चर॑सि । जिघ्न॑मानः । तव॑ । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । पर्व॑ता॒सः । अनु॑ । व्र॒ताय॑ । निमि॑ताऽइव । त॒स्थुः॒ ॥

Mantra without Swara
त्वं हि ष्मा च्यावयन्नच्युतान्येको वृत्रा चरसि जिघ्नमानः। तव द्यावापृथिवी पर्वतासोऽनु व्रताय निमितेव तस्थुः॥

त्वम्। हि। स्म। च्यावयन्। अच्युतानि। एकः। वृत्रा। चरसि। जिघ्नमानः। तव। द्यावापृथिवी इति। पर्वतासः। अनु। व्रताय। निमिताऽइव। तस्थुः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 1 Mantra » 4

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Meaning
हे राजन् ! (त्वम्) आप (एकः) सहाय के विना स्वयं बलवान् (हि) जिससे (अच्युतानि) प्रबल शत्रुओं की सेनाओं को (च्यावयन्) भय से गिराते हुए (स्म) ही वर्त्तमान हैं जैसे सूर्य के सम्बन्ध में (द्यावापृथिवी) प्रकाश और भूमि (पर्वतासः) पर्वत के सदृश बड़े-बड़े मेघ और (वृत्रा) मेघों के टुकड़े रूप बद्दल (निमितेव) जैसे निरन्तर प्रमाण किये हुए पदार्थ वैसे (तस्थुः) स्थिर होते हैं वैसे ही (अनु) (व्रताय) सत्यभाषण आदि कर्म वा उत्तम स्वभाव के लिये शत्रुओं का (जिघ्नमानः) नाशकर्त्ता होओ तो (ते) आपका निश्चय से विजय होवे ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य नियमपूर्वक वर्त्तमान हो के निवारण करने योग्य पदार्थों का निवारण करके रक्षा करने योग्य पदार्थों की रक्षा करता है, वैसे ही आप वर्जने योग्य शत्रुओं का वर्जन करके प्रजाओं की निरन्तर रक्षा कीजिये ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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