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Rigveda Mandal 3 / Sukta 30 / Mantra 21

62 Sukta
22 Mantra
3/30/21
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ नो॑ गो॒त्रा द॑र्दृहि गोपते॒ गाः सम॒स्मभ्यं॑ स॒नयो॑ यन्तु॒ वाजाः॑। दि॒वक्षा॑ असि वृषभ स॒त्यशु॑ष्मो॒ऽस्मभ्यं॒ सु म॑घवन्बोधि गो॒दाः॥

आ । नः॒ । गो॒त्रा । द॒र्दृ॒हि॒ । गो॒ऽप॒ते॒ । गाः । सम् । अ॒स्मभ्य॑म् । स॒नयः॑ । य॒न्तु॒ । वाजाः॑ । दि॒वक्षाः॑ । अ॒सि॒ । वृ॒ष॒भ॒ । स॒त्यऽशु॑ष्मः । अ॒स्मभ्य॑म् । सु । म॒घ॒ऽव॒न् । बो॒धि॒ । गो॒ऽदाः ॥

Mantra without Swara
आ नो गोत्रा दर्दृहि गोपते गाः समस्मभ्यं सनयो यन्तु वाजाः। दिवक्षा असि वृषभ सत्यशुष्मोऽस्मभ्यं सु मघवन्बोधि गोदाः॥

आ। नः। गोत्रा। दर्दृहि। गोऽपते। गाः। सम्। अस्मभ्यम्। सनयः। यन्तु। वाजाः। दिवक्षाः। असि। वृषभ। सत्यऽशुष्मः। अस्मभ्यम्। सु। मघऽवन्। बोधि। गोऽदाः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 4 Mantra » 6

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Meaning
हे (वृषभ) बलवान् (मघवन्) बहुत श्रेष्ठ धन से युक्त ! जिससे आप (गोदाः) वाणी आदि के दाता (सत्यशुष्मः) सत्य बलवाले (असि) हैं इससे (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (सु) (बोधि) आनन्ददायक हूजिये हे (गोपते) भूमि के स्वामी जैसे (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (सनयः) संविभाग करने के योग्य (दिवक्षाः) विज्ञानरूप प्रकाश आदि से पूरित (वाजाः) विज्ञान और अन्न आदि के प्राप्त करानेवाले व्यवहार (सम्) (यन्तु) प्राप्त होवें वैसे ही आप (नः) हम लोगों के (गोत्रा) कुलों और (गाः) पृथिवियों को (आ) सब प्रकार (दर्दृहि) अत्यन्त वृद्धि कीजिये ॥२१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सत्य आचरण करनेवाले विद्वान् लोग मनुष्यों के उपदेशकारक होवें, तो उन जनों का कुछ भी सुख अप्राप्त और अरक्ष्य न होवे ॥२१॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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