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Rigveda Mandal 3 / Sukta 30 / Mantra 2

62 Sukta
22 Mantra
3/30/2
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
न ते॑ दू॒रे प॑र॒मा चि॒द्रजां॒स्या तु प्र या॑हि हरिवो॒ हरि॑भ्याम्। स्थि॒राय॒ वृष्णे॒ सव॑ना कृ॒तेमा यु॒क्ता ग्रावा॑णः समिधा॒ने अ॒ग्नौ॥

न । ते॒ । दू॒रे । प॒र॒मा । चि॒त् । रजां॑सि । आ । तु । प्र । या॒हि॒ । ह॒रि॒ऽवः॒ । हरि॑ऽभ्याम् । स्थि॒राय॑ । वृष्णे॑ । सव॑ना । कृ॒ता । इ॒मा । यु॒क्ताः । ग्रावा॑णः । स॒म्ऽइ॒धा॒ने । अ॒ग्नौ ॥

Mantra without Swara
न ते दूरे परमा चिद्रजांस्या तु प्र याहि हरिवो हरिभ्याम्। स्थिराय वृष्णे सवना कृतेमा युक्ता ग्रावाणः समिधाने अग्नौ॥

न। ते। दूरे। परमा। चित्। रजांसि। आ। तु। प्र। याहि। हरिऽवः। हरिऽभ्याम्। स्थिराय। वृष्णे। सवना। कृता। इमा। युक्ताः। ग्रावाणः। सम्ऽइधाने। अग्नौ॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 1 Mantra » 2

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Meaning
हे (हरिवः) उत्तम घोड़ों के वाहनों से युक्त ! आप (हरिभ्याम्) घोड़ों से (प्र) (आ, याहि) आइये ऐसा करने से (परमा) उत्तम (रजांसि) लोकों के स्थान (ते) आपके (दूरे) दूर (न) नहीं होंगे जो (समिधाने) हवन करने योग्य प्रदीप्त किये जाते हुए (अग्नौ) अग्नि में (स्थिराय) दृढ़ (वृष्णे) बलवान् के लिये (कृता) किये गये (इमा) इन (सवना) ऐश्वर्य वृद्धि के साधक कर्मों को करो तो (तु) तो (युक्ताः) उद्यत (ग्रावाणः) मेघ (चित्) भी बहुत से होवें ॥२॥
Essence
मनुष्य यदि शीघ्र चलनेवाले घोड़ों से देशान्तर जाने की इच्छा करें, तो सब समीप ही है। यदि नियम से अग्नि को प्रज्वलित कर उसमें होम करें, तो वर्षा होना सुगम ही जानो ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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