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Rigveda Mandal 3 / Sukta 30 / Mantra 19

62 Sukta
22 Mantra
3/30/19
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ नो॑ भर॒ भग॑मिन्द्र द्यु॒मन्तं॒ नि ते॑ दे॒ष्णस्य॑ धीमहि प्ररे॒के। ऊ॒र्वइ॑व पप्रथे॒ कामो॑ अ॒स्मे तमा पृ॑ण वसुपते॒ वसू॑नाम्॥

आ । नः॒ । भ॒र॒ । भग॑म् । इ॒न्द्र॒ । द्यु॒ऽमन्त॑म् । नि । ते॒ । दे॒ष्णस्य॑ । धी॒म॒हि॒ । प्र॒ऽरे॒के । ऊ॒र्वःऽइ॑व । प॒प्र॒थे॒ । कामः॑ । अ॒स्मे इति॑ । तम् । आ । पृ॒ण॒ । व॒सु॒ऽप॒ते॒ । वसू॑नाम् ॥

Mantra without Swara
आ नो भर भगमिन्द्र द्युमन्तं नि ते देष्णस्य धीमहि प्ररेके। ऊर्वइव पप्रथे कामो अस्मे तमा पृण वसुपते वसूनाम्॥

आ। नः। भर। भगम्। इन्द्र। द्युऽमन्तम्। नि। ते। देष्णस्य। धीमहि। प्रऽरेके। ऊर्वःऽइव। पप्रथे। कामः। अस्मे इति। तम्। आ। पृण। वसुऽपते। वसूनाम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 4 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वसूनाम्) जनों के (वसुपते) धनपालक (इन्द्र) सुख के दाता ! जिस (देष्णस्य) देनेवाले (ते) आपके (प्ररेके) उत्तम शङ्कायुक्त व्यवहार में हम लोग (नि) (धीमहि) धारण करें वह आप (नः) हम लोगों के लिये (द्युमन्तम्) उत्तम प्रकाशयुक्त (भगम्) सेवन करने योग्य ऐश्वर्य्य को (आ) सब प्रकार (भर) धारण करो और जो (अस्मे) हम लोगों के लिये (कामः) इच्छा (ऊर्वइव) इन्धन युक्त अग्नि के सदृश (पप्रथे) वृद्धि को प्राप्त होवें (तम्) उसको (आ) (पृण) पूर्ण करो ॥१९॥
Essence
वही मनुष्य यथार्थवक्ता है, जिसका सर्वस्व दूसरे पुरुषादि के उपकार के लिये होता है, इस विषय में कोई शङ्का नहीं है ॥१९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।