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Rigveda Mandal 3 / Sukta 30 / Mantra 17

62 Sukta
22 Mantra
3/30/17
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उद्वृ॑ह॒ रक्षः॑ स॒हमू॑लमिन्द्र वृ॒श्चा मध्यं॒ प्रत्यग्रं॑ शृणीहि। आ कीव॑तः सल॒लूकं॑ चकर्थ ब्रह्म॒द्विषे॒ तपु॑षिं हे॒तिम॑स्य॥

उत् । वृ॒ह॒ । रक्षः॑ । स॒हऽमू॑लम् । इ॒न्द्र॒ । वृ॒श्च । मध्य॑म् । प्रति॑ । अग्र॑म् । शृ॒णी॒हि॒ । आ । कीव॑तः । स॒ल॒लूक॑म् । च॒क॒र्थ॒ । ब्र॒ह्म॒ऽद्विषे॑ । तपु॑षिम् । हे॒तिम् । अ॒स्य॒ ॥

Mantra without Swara
उद्वृह रक्षः सहमूलमिन्द्र वृश्चा मध्यं प्रत्यग्रं शृणीहि। आ कीवतः सललूकं चकर्थ ब्रह्मद्विषे तपुषिं हेतिमस्य॥

उत्। वृह। रक्षः। सहऽमूलम्। इन्द्र। वृश्च। मध्यम्। प्रति। अग्रम्। शृणीहि। आ। कीवतः। सललूकम्। चकर्थ। ब्रह्मऽद्विषे। तपुषिम्। हेतिम्। अस्य॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 4 Mantra » 2

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Meaning
हे (इन्द्र) दुष्ट पुरुषों के नाशकर्त्ता ! आप (उत्) उत्तमता के साथ (वृह) सुखवृद्धि करो (सहमूलम्) जड़सहित (रक्षः) बुरे आचार को (वृश्च) तोड़ो (अस्य) इसके ऊपर (तपुषिम्) प्रतापयुक्त (हेतिम्) वज्र को फेंक के इसके (मध्यम्) मध्य में उत्पन्न हुए और (अग्रम्) अग्रभाग के (प्रति) प्रति (शृणीहि) नाश करो तथा (ब्रह्मद्विषे) ब्रह्म परमात्मा वा वेद के लिये वर्त्तमान (सललूकम्) अच्छी तरह लोभी (कीवतः) कितनों को (आ) (चकर्थ) सब प्रकार काटो ॥१७॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि कभी भी धार्मिक पुरुषों के ऊपर शस्त्रों का प्रहार न करें और दुष्ट पुरुषों को शस्त्रों से मारे विना न छोड़ें, ऐसा करने से सब प्रकार सुख की वृद्धि होवे ॥१७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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