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Rigveda Mandal 3 / Sukta 30 / Mantra 14

62 Sukta
22 Mantra
3/30/14
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
महि॒ ज्योति॒र्निहि॑तं व॒क्षणा॑स्वा॒मा प॒क्वं च॑रति॒ बिभ्र॑ती॒ गौः। विश्वं॒ स्वाद्म॒ संभृ॑तमु॒स्रिया॑यां॒ यत्सी॒मिन्द्रो॒ अद॑धा॒द्भोज॑नाय॥

महि॑ । ज्योतिः॑ । निऽहि॑तम् । व॒क्षणा॑सु । आ॒मा । प॒क्वम् । च॒र॒ति॒ । बिभ्र॑ती । गौः । विश्व॑म् । स्वाद्म॑ । सम्ऽभृ॑तम् उ॒स्रिया॑याम् । यत् । सी॒म् । इन्द्रः॑ । अद॑धात् । भोज॑नाय ॥

Mantra without Swara
महि ज्योतिर्निहितं वक्षणास्वामा पक्वं चरति बिभ्रती गौः। विश्वं स्वाद्म संभृतमुस्रियायां यत्सीमिन्द्रो अदधाद्भोजनाय॥

महि। ज्योतिः। निऽहितम्। वक्षणासु। आमा। पक्वम्। चरति। बिभ्रती। गौः। विश्वम्। स्वाद्म। सम्ऽभृतम् उस्रियायाम्। यत्। सीम्। इन्द्रः। अदधात्। भोजनाय॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 3 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
(यत्) जो (गौः) चलनेवाली (वक्षणासु) बहती हुई नदियों में (आमा) कच्चे वा (पक्वम्) पके हुए को (बिभ्रती) धारण करती हुई (चरति) चलती है जो इस संसार में (महि) बड़ा (निहितम्) स्थित (ज्योतिः) तेज वा (उस्रियायाम्) पृथिवी में (विश्वम्) संपूर्ण (स्वाद्म) अतिस्वादुवाले (सम्भृतम्) उत्तम प्रकार, धारण वा पोषण किये हुए पदार्थ को प्राप्त होती है वह (इन्द्रः) बिजुली (भोजनाय) पालन वा भोजन के लिये सबको (सीम्) सब ओर से (अदधात्) धारण करती है, यह सब जनों को जानना चाहिये ॥१४॥
Essence
जो बिजुली भूमि जल वायु और अन्तरिक्ष तथा उनके विकारों और पदार्थों में व्यापक हो और सबको धारण कर पालन करती है, उसकी विद्या को सब लोग धारण वा स्वीकार करें ॥१४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।