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Rigveda Mandal 3 / Sukta 30 / Mantra 13

62 Sukta
22 Mantra
3/30/13
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दिदृ॑क्षन्त उ॒षसो॒ याम॑न्न॒क्तोर्वि॒वस्व॑त्या॒ महि॑ चि॒त्रमनी॑कम्। विश्वे॑ जानन्ति महि॒ना यदागा॒दिन्द्र॑स्य॒ कर्म॒ सुकृ॑ता पु॒रूणि॑॥

दिदृ॑क्षन्ते । उ॒षसः॑ । याम॑न् । अ॒क्तोः । वि॒वस्व॑त्याः । महि॑ । चि॒त्रम् । अनी॑कम् । विश्वे॑ । जा॒न॒न्ति॒ । म॒हि॒ना । यत् । आ । अगा॑त् । इन्द्र॑स्य । कर्म॑ । सुऽकृ॑ता । पु॒रूणि॑ ॥

Mantra without Swara
दिदृक्षन्त उषसो यामन्नक्तोर्विवस्वत्या महि चित्रमनीकम्। विश्वे जानन्ति महिना यदागादिन्द्रस्य कर्म सुकृता पुरूणि॥

दिदृक्षन्ते। उषसः। यामन्। अक्तोः। विवस्वत्याः। महि। चित्रम्। अनीकम्। विश्वे। जानन्ति। महिना। यत्। आ। अगात्। इन्द्रस्य। कर्म। सुऽकृता। पुरूणि॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 3 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
(यत्) जो (विश्वे) संपूर्ण मनुष्य (विवस्वत्याः) सूर्य मण्डल के निमित्त व्यवहारवाली (उषसः) प्रभात वेलाओं को (अक्तोः) रात्रि के (यामन्) मार्ग में (दिदृक्षन्ते) देखने की इच्छा करते हैं (महिना) महिमा से (महि) बड़ी (चित्रम्) अद्भुत (अनीकम्) सेना को (जानन्ति) जानते हैं (इन्द्रस्य) बिजुली के (पुरूणि) बहुत (सुकृता) उत्तम प्रकार किये गये (कर्म) कर्मों को देखने की इच्छा करते हैं, उनको जो (आ, अगात्) प्राप्त हो, वह सुखी होवे ॥१३॥
Essence
जो परीक्षक लोग प्रातःकाल उठ के प्रयत्न से व्यवहारों को सिद्ध करते हैं, वे इस संसार में ज्ञान विशेष से प्रतिष्ठा को प्राप्त और बल से युक्त होते हैं ॥१३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।