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Rigveda Mandal 3 / Sukta 30 / Mantra 11

62 Sukta
22 Mantra
3/30/11
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
एको॒ द्वे वसु॑मती समी॒ची इन्द्र॒ आ प॑प्रौ पृथि॒वीमु॒त द्याम्। उ॒तान्तरि॑क्षाद॒भि नः॑ समी॒क इ॒षो र॒थीः स॒युजः॑ शूर॒ वाजा॑न्॥

एकः॑ । द्वे इति॑ । वसु॑मती॒ इति॒ वसु॑ऽमती । स॒मी॒ची इति॑ स॒म्ऽई॒ची । इन्द्रः॑ । आ । प॒प्रौ॒ । पृ॒थि॒वीम् । उ॒त । द्याम् । उ॒त । अ॒न्तरि॑क्षात् । अ॒भि । नः॒ । स॒म्ऽई॒के । इ॒षः । र॒थीः । स॒ऽयुजः॑ । शू॒र॒ । वाजा॑न् ॥

Mantra without Swara
एको द्वे वसुमती समीची इन्द्र आ पप्रौ पृथिवीमुत द्याम्। उतान्तरिक्षादभि नः समीक इषो रथीः सयुजः शूर वाजान्॥

एकः। द्वे इति। वसुमती इति वसुऽमती। समीची इति सम्ऽईची। इन्द्रः। आ। पप्रौ। पृथिवीम्। उत। द्याम्। उत। अन्तरिक्षात्। अभि। नः। सम्ऽईके। इषः। रथीः। सऽयुजः। शूर। वाजान्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 3 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शूर) दुष्टजनों के नाशकारक ! जैसे (एकः) सहायरहित अकिल्ली (रथीः) प्रशंसनीय रथरूप वाहन के सहित (इन्द्रः) बिजुली (द्वे) दो (समीची) समानता को प्राप्त (वसुमती) बहुत धनों से युक्त (पृथिवीम्) अन्तरिक्ष वा भूमि को (उत) और भी (द्याम्) प्रकाश को (आ) (पप्रौ) पूर्ण करती (समीके) समीप में (अन्तरिक्षात्) मध्य में वर्त्तमान अवकाश से (सयुजः) तुल्यता के साथ परस्पर मिले हुए मित्र जन (नः) हम लोगों के लिये (इषः) इच्छाओं को (उत) और (वाजान्) अन्न आदि वस्तुओं को (अभि) सब ओर से पूर्ण करते वे संपूर्ण जनों से सत्कार करने योग्य हैं ॥११॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो भूमि के सदृश प्रजाओं के धारण करने और बिजुली के सदृश अतिउत्तम ऐश्वर्य्य के देनेवाले प्रजाजन हों, वे सम्पूर्ण राज्य की रक्षा कर सकें ॥११॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।