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Rigveda Mandal 3 / Sukta 30 / Mantra 10

62 Sukta
22 Mantra
3/30/10
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒ला॒तृ॒णो ब॒ल इ॑न्द्र ब्र॒जो गोः पु॒रा हन्तो॒र्भय॑मानो॒ व्या॑र। सु॒गान्प॒थो अ॑कृणोन्नि॒रजे॒ गाः प्राव॒न्वाणीः॑ पुरुहू॒तं धम॑न्तीः॥

अ॒ला॒तृ॒णः । व॒लः । इ॒न्द्र॒ । व्र॒जः । गोः । पु॒रा । हन्तोः॑ । भय॑मानः । वि । आ॒र॒ । सु॒ऽगान् । प॒थः । अ॒कृ॒णो॒त् । निः॒ऽअजे॑ । गाः । प्र । आ॒व॒न् । वाणीः॑ । पु॒रु॒ऽहू॒तम् । धम॑न्तीः ॥

Mantra without Swara
अलातृणो बल इन्द्र ब्रजो गोः पुरा हन्तोर्भयमानो व्यार। सुगान्पथो अकृणोन्निरजे गाः प्रावन्वाणीः पुरुहूतं धमन्तीः॥

अलातृणः। बलः। इन्द्र। ब्रजः। गोः। पुरा। हन्तोः। भयमानः। वि। आर। सुऽगान्। पथः। अकृणोत्। निःऽअजे। गाः। प्र। आवन्। वाणीः। पुरुऽहूतम्। धमन्तीः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 2 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) श्रेष्ठ ऐश्वर्य्य के दाता ! (अलातृणः) सम्पूर्ण संसार के प्रलयकर्त्ता (बलः) बलयुक्त (ब्रजः) चलनेवाले (भयमानः) भय को प्राप्त होते हुए आप (सुगान्) सुख से जिनमें मनुष्य आदि चलें ऐसे (पथः) मार्गों को (वि) (आर) विशेष करके प्राप्त होइये जो (पुरा) प्रथम (गोः) पृथिवी का (हन्तोः) नाश करने की (अकृणोत्) क्रिया करें वा जो (पुरुहूतम्) बहुतों से प्रशंसायुक्त (धमन्तीः) शब्द करती हुई (वाणीः) उत्तम प्रकार शिक्षायुक्त (गाः) चलनेवाली वाणी (प्र) (आवन्) अतिशय रक्षा करती हैं उसको और उनको (निरजे) अत्यन्त चलने के लिये विशेष करके प्राप्त होइये ॥१०॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि सदा ही अधर्म के आचरण से डर के धर्म में प्रवृत्त हों और बुरे व्यसनों को त्याग के धर्मयुक्त मार्ग से चलें ॥१०॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।