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Rigveda Mandal 3 / Sukta 29 / Mantra 9

62 Sukta
16 Mantra
3/29/9
Devata- अग्निः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
कृ॒णोत॑ धू॒मं वृष॑णं सखा॒योऽस्रे॑धन्त इतन॒ वाज॒मच्छ॑। अ॒यम॒ग्निः पृ॑तना॒षाट् सु॒वीरो॒ येन॑ दे॒वासो॒ अस॑हन्त॒ दस्यू॑न्॥

कृ॒णोत॑ । धू॒म॑म् । वृष॑णम् । स॒खा॒यः॒ । अस्रे॑धन्तः । इ॒त॒न॒ । वाज॑म् । अच्छ॑ । अ॒यम् । अ॒ग्निः । पृ॒त॒ना॒षाट् । सु॒ऽवीरः॑ । येन॑ । दे॒वासः॑ । अस॑हन्त । दस्यू॑न् ॥

Mantra without Swara
कृणोत धूमं वृषणं सखायोऽस्रेधन्त इतन वाजमच्छ। अयमग्निः पृतनाषाट् सुवीरो येन देवासो असहन्त दस्यून्॥

कृणोत। धूमम्। वृषणम्। सखायः। अस्रेधन्तः। इतन। वाजम्। अच्छ। अयम्। अग्निः। पृतनाषाट्। सुऽवीरः। येन। देवासः। असहन्त। दस्यून्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 33 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् जनो ! आप लोग (अस्रेधन्तः) उत्साह से पूरित (सखायः) मित्र हुए (वृषणम्) जल से अच्छे प्रकार सींचे गये (धूमम्) भाफ को (कृणोत) करो (वाजम्) अन्न वेग और विज्ञान आदि को (अच्छ) उत्तम प्रकार (इतन) प्राप्त होओ तो (अयम्) यह (अग्निः) बिजुली के सदृश तेजस्वी (पृतनाषाट्) सेनाओं के सहित वर्त्तमान (सुवीरः) श्रेष्ठ वीरों से युक्त और (येन) जिस पुरुष के साथ (देवासः) विद्वान् वा शूर लोग (दस्यून) अति दुष्ट कर्म करनेवाले जनों को (असहन्त) सहते हैं, उसको प्राप्त होइये ॥९॥
Essence
हे विद्वान् जनो ! काष्ठ अग्नि और जल के संयोग से उत्पन्न हुए धूम से अनेक कार्य्यों को परस्पर मित्रभाव के साथ सिद्ध करो। जैसे धर्मपूर्वक वर्त्ताव रखनेवाले विद्यायुक्त शूरवीर पुरुष दुष्टकर्मकारियों का नाश करके राजा होते हैं, वैसे ही यह अग्नि उत्तम प्रकार यन्त्र आदि से युक्त किया गया दारिद्र्य आदि को नाश करके अनगिनती धन को उत्पन्न करता है ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।