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Rigveda Mandal 3 / Sukta 29 / Mantra 6

62 Sukta
16 Mantra
3/29/6
Devata- अग्निः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यदी॒ मन्थ॑न्ति बा॒हुभि॒र्वि रो॑च॒तेऽश्वो॒ न वा॒ज्य॑रु॒षो वने॒ष्वा। चि॒त्रो न याम॑न्न॒श्विनो॒रनि॑वृतः॒ परि॑ वृण॒क्त्यश्म॑न॒स्तृणा॒ दह॑न्॥

यदि॑ । मन्थ॑न्ति । बा॒हुऽभिः॑ । वि । रो॒च॒ते॒ । अश्वः॑ । न । वा॒जी । अ॒रु॒षः । वने॑षु । आ । चि॒त्रः । न । याम॑न् । अ॒श्विनोः॑ । अनि॑ऽवृतः । परि॑ । वृ॒ण॒क्ति॒ । अश्म॑नः । तृणा॑ । दह॑न् ॥

Mantra without Swara
यदी मन्थन्ति बाहुभिर्वि रोचतेऽश्वो न वाज्यरुषो वनेष्वा। चित्रो न यामन्नश्विनोरनिवृतः परि वृणक्त्यश्मनस्तृणा दहन्॥

यदि। मन्थन्ति। बाहुऽभिः। वि। रोचते। अश्वः। न। वाजी। अरुषः। वनेषु। आ। चित्रः। न। यामन्। अश्विनोः। अनिऽवृतः। परि। वृणक्ति। अश्मनः। तृणा। दहन्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 33 Mantra » 1

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Meaning
जो मनुष्य (बाहुभिः) बाहुओं से (यदि) यदि अग्नि को (मन्थन्ति) मन्थते हैं तो वह (वनेषु) किरणों में (अरुषः) मर्मस्थलों में वर्त्तमान (वाजी) वेगयुक्त (अश्वः) उत्तम घोड़े के (न) सदृश (वि) (आ, रोचते) विशेषभाव से प्रकाशित होता है (अश्विनोः) सूर्य्य चन्द्रमा के मध्य में (अनिवृतः) निरन्तर प्राप्त (यामन्) रात्रि में (चित्रः) अद्भुत के (न) तुल्य (तृणा) घास विशेषों को (दहन्) भस्म करता हुआ (अश्मनः) पत्थर वा मेघ का (परि) सब प्रकार (वृणक्ति) छेदन करता है, उसको इसप्रकार सब लोग प्रकट करें ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। घिसने से बलयुक्त हुआ अग्नि काष्ठ आदि को जलाता और घोड़े के तुल्य वेगवान् होता हुआ अद्भुत कार्य्यों को सिद्ध करता है, यह जानना चाहिये ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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