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Rigveda Mandal 3 / Sukta 29 / Mantra 4

62 Sukta
16 Mantra
3/29/4
Devata- अग्निः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
इळा॑यास्त्वा प॒दे व॒यं नाभा॑ पृथि॒व्या अधि॑। जात॑वेदो॒ नि धी॑म॒ह्यग्ने॑ ह॒व्याय॒ वोळ्ह॑वे॥

इळा॑याः । त्वा॒ । प॒दे । व॒यम् । नाभा॑ । पृ॒थि॒व्याः । अधि॑ । जात॑ऽवेदः । नि । धी॒म॒हि॒ । अग्ने॑ । ह॒व्याय॑ । वोळ्ह॑वे ॥

Mantra without Swara
इळायास्त्वा पदे वयं नाभा पृथिव्या अधि। जातवेदो नि धीमह्यग्ने हव्याय वोळ्हवे॥

इळायाः। त्वा। पदे। वयम्। नाभा। पृथिव्याः। अधि। जातऽवेदः। नि। धीमहि। अग्ने। हव्याय। वोळ्हवे॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 32 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् जनो ! जैसे (वयम्) हम लोग (इडायाः) पृथिवी के (अधि) ऊपर (पदे) प्राप्त होने पर (पृथिव्याः) अन्तरिक्ष के (नाभा) मध्य में (हव्याय) प्रशंसा करने योग्य (वोढवे) वाहन के लिये (त्वा) उस (जातवेदः) धनों के उत्पन्नकर्त्ता (अग्ने) अग्नि को (नि) (धीमहि) उत्तम प्रकार धारण करें, वैसे ही आप लोग भी धारण करो ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग इस अग्नि की पृथिवी के ऊपर और अन्तरिक्ष के मध्य में उत्तम प्रकार परीक्षा ले के वाहन आदि चलाने के लिये अग्नि को धारण करते हैं, वे धनयुक्त होते हैं ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।