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Rigveda Mandal 3 / Sukta 29 / Mantra 14

62 Sukta
16 Mantra
3/29/14
Devata- अग्निः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
प्र स॒प्तहो॑ता सन॒काद॑रोचत मा॒तुरु॒पस्थे॒ यदशो॑च॒दूध॑नि। न नि मि॑षति सु॒रणो॑ दि॒वेदि॑वे॒ यदसु॑रस्य ज॒ठरा॒दजा॑यत॥

प्र । स॒प्तऽहो॑ता । स॒न॒कात् । अ॒रो॒च॒त॒ । मा॒तुः । उ॒पऽस्थे॑ । यत् । अशो॑चत् । ऊध॑नि । न । नि । मि॒ष॒ति॒ । सु॒ऽरणः॑ । दि॒वेऽदि॑वे । यत् । असु॑रस्य । ज॒ठरा॑त् । अजा॑यत ॥

Mantra without Swara
प्र सप्तहोता सनकादरोचत मातुरुपस्थे यदशोचदूधनि। न नि मिषति सुरणो दिवेदिवे यदसुरस्य जठरादजायत॥

प्र। सप्तऽहोता। सनकात्। अरोचत। मातुः। उपऽस्थे। यत्। अशोचत्। ऊधनि। न। नि। मिषति। सुऽरणः। दिवेऽदिवे। यत्। असुरस्य। जठरात्। अजायत॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 34 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (सप्तहोता) सात प्राणों से ग्रहण करने योग्य अग्नि (सनकात्) अनादि परम्परा से सिद्ध कारण से उत्पन्न हुआ (मातुः) वायु के (उपस्थे) समीप में (प्रारोचत) प्रकाशित होता है (यत्) जो (ऊधनि) रात्रि में (अशोचत्) प्रकाशित होता है और जो (सुरणः) श्रेष्ठ युद्ध का साधन (दिवेदिवे) प्रतिदिन (न) (नि) अत्यन्त (मिषति) नहीं सींचता है (यत्) जो (असुरस्य) रूप से रहित वायु के (जठरात्) मध्य से (अजायत) उत्पन्न होता है, उसको अच्छे प्रकार जानो ॥१४॥
Essence
जो अग्नि अन्न आदि को शुष्क करनेवाला वायु रूप कारण से प्रसिद्ध प्रकृति नामक कारण से उत्पन्न हुआ है, उसको जानकर बहुत से व्यवहारों को सकल जन प्रसिद्ध करें ॥१४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।