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Rigveda Mandal 3 / Sukta 29 / Mantra 12

62 Sukta
16 Mantra
3/29/12
Devata- अग्निः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- भुरिगनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
सु॒नि॒र्मथा॒ निर्म॑थितः सुनि॒धा निहि॑तः क॒विः। अग्ने॑ स्वध्व॒रा कृ॑णु दे॒वान्दे॑वय॒ते य॑ज॥

सु॒निः॒ऽमथा॑ । निःऽम॑थितः । सु॒ऽनि॒धा । निऽहि॑तः । क॒विः । अग्ने॑ । सु॒ऽअ॒ध्व॒रा । कृ॒णु॒ । दे॒वान् । दे॒व॒ऽय॒ते । य॒ज॒ ॥

Mantra without Swara
सुनिर्मथा निर्मथितः सुनिधा निहितः कविः। अग्ने स्वध्वरा कृणु देवान्देवयते यज॥

सुनिःऽमथा। निःऽमथितः। सुऽनिधा। निऽहितः। कविः। अग्ने। सुऽअध्वरा। कृणु। देवान्। देवऽयते। यज॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 34 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्वी विद्वान् पुरुष ! जैसे (सुनिर्मथा) सुन्दर मथने के वस्तु से (निर्मथितः) अत्यन्त मथा (सुनिधा) उत्तम आधार वस्तु में (निहितः) धरा गया (कविः) और सर्वत्र दीख पड़नेवाला अग्नि बहुत से कार्य्यों को सिद्ध करता है, वैसे ही (स्वध्वरा) उत्तम अहिंसा आदि कर्मों से युक्त (देवान्) उत्तम गुणों को (कृणु) धारण करो और इन (देवयते) उत्तम गुणों की कामना करते हुए पुरुष के लिये उन गुणों को (यज) दीजिये ॥१२॥
Essence
जैसे विद्या से रचे हुए कलायन्त्रों में रक्खा गया अग्नि अत्यन्त मथने और घिसने से वेग आदि गुणों को उत्पन्न कर बहुत से कार्य्यों को सिद्ध करता है, वैसे ही उत्तम कर्म्मों को करके श्रेष्ठ गुणों को प्राप्त होओ ॥१२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।