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Rigveda Mandal 3 / Sukta 28 / Mantra 4

62 Sukta
6 Mantra
3/28/4
Devata- अग्निः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
माध्य॑न्दिने॒ सव॑ने जातवेदः पुरो॒ळाश॑मि॒ह क॑वे जुषस्व। अग्ने॑ य॒ह्वस्य॒ तव॑ भाग॒धेयं॒ न प्र मि॑नन्ति वि॒दथे॑षु॒ धीराः॑॥

माध्य॑न्दिने । सव॑ने । जा॒त॒ऽवे॒दः॒ । पु॒रो॒ळाश॑म् । इ॒ह । क॒वे॒ । जु॒ष॒स्व॒ । अग्ने॑ । य॒ह्वस्य॑ । तव॑ । भा॒ग॒ऽधेय॑म् । न । प्र । मि॒न॒न्ति॒ । वि॒दथे॑षु । धीराः॑ ॥

Mantra without Swara
माध्यन्दिने सवने जातवेदः पुरोळाशमिह कवे जुषस्व। अग्ने यह्वस्य तव भागधेयं न प्र मिनन्ति विदथेषु धीराः॥

माध्यन्दिने। सवने। जातऽवेदः। पुरोळाशम्। इह। कवे। जुषस्व। अग्ने। यह्वस्य। तव। भागऽधेयम्। न। प्र। मिनन्ति। विदथेषु। धीराः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 31 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (जातवेदः) विज्ञान से युक्त (कवे) उत्तम बुद्धिमान् (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजयुक्त ! आप (इह) इस संसार में जो (धीराः) योगी जन (यह्वस्य) श्रेष्ठ (तव) आपके (विदथेषु) विज्ञान वा संग्रामों में (भागधेयम्) भाग्य को (न) नहीं (प्र) (मिनन्ति) नाश करते हैं उस शिक्षा से सहित होकर (माध्यन्दिने) दिन के मध्य समय के (सवने) होम आदि कर्म में अग्नि के सदृश (पुरोडाशम्) उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त अन्न आदि का (जुषस्व) सेवन करो ॥४॥
Essence
जो मनुष्य प्रातःकाल तथा दिन के मध्यभाग समय के होमों को करके उत्तम प्रकार छौंकने आदि से संस्कारयुक्त नित्य नियमित अन्न का भोजन करते हैं, वे ही भाग्यशाली होकर बड़े सुख और निश्चित विजय को प्राप्त होते हैं ॥४॥
Subject
अब कौन मनुष्य सुखी होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।