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Rigveda Mandal 3 / Sukta 28 / Mantra 2

62 Sukta
6 Mantra
3/28/2
Devata- अग्निः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
पु॒रो॒ळा अ॑ग्ने पच॒तस्तुभ्यं॑ वा घा॒ परि॑ष्कृतः। तं जु॑षस्व यविष्ठ्य॥

पु॒रो॒ळाः । अ॒ग्ने॒ । प॒च॒तः । तुभ्य॑म् । वा॒ । घ॒ । परि॑ऽकृतः । तम् । जु॒ष॒स्व॒ । य॒वि॒ष्ठ्य॒ ॥

Mantra without Swara
पुरोळा अग्ने पचतस्तुभ्यं वा घा परिष्कृतः। तं जुषस्व यविष्ठ्य॥

पुरोळाः। अग्ने। पचतः। तुभ्यम्। वा। घ। परिऽकृतः। तम्। जुषस्व। यविष्ठ्य॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 31 Mantra » 2

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Meaning
हे (यविष्ठ्य) अतिशय युवा पुरुषों में चतुर (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्वी जन ! जो (तुभ्यम्) आपके लिये (पुरोळाः) वेद विधि से संस्कारयुक्त (पचतः) पाककर्त्ता हुआ (वा) अथवा (परिष्कृतः) सब प्रकार शुद्ध किया गया है (तम्) उसकी (घ) ही (जुषस्व) सेवा करो ॥२॥
Essence
जैसे भोजन में प्रीतिकर्त्ता पुरुष अपने लिये उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त अन्न आदि पदार्थों को सिद्ध और उनका भोजन करके आनन्दयुक्त होता है, वैसे ही उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त हवन की सामग्री को प्राप्त होकर अग्नि सम्पूर्ण जनों को आनन्द देता है ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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