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Rigveda Mandal 3 / Sukta 27 / Mantra 5

62 Sukta
15 Mantra
3/27/5
Devata- अग्निः Rishi- विश्वामित्रः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
पृ॒थु॒पाजा॒ अम॑र्त्यो घृ॒तनि॑र्णि॒क्स्वा॑हुतः। अ॒ग्निर्य॒ज्ञस्य॑ हव्य॒वाट्॥

पृ॒थु॒ऽपाजाः॑ । अम॑र्त्यः । घृ॒तऽनि॑र्निक् । सुऽआ॑हुतः । अ॒ग्निः । य॒ज्ञस्य॑ । ह॒व्य॒ऽवाट् ॥

Mantra without Swara
पृथुपाजा अमर्त्यो घृतनिर्णिक्स्वाहुतः। अग्निर्यज्ञस्य हव्यवाट्॥

पृथुऽपाजाः। अमर्त्यः। घृतऽनिर्निक्। सुऽआहुतः। अग्निः। यज्ञस्य। हव्यऽवाट्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 28 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! आप लोग जो (पृथुपाजाः) विस्तारसहित बलयुक्त (अमर्त्यः) अपने स्वरूप से नाशरहित (यज्ञस्य) राज्यपालन आदि व्यवहार के (हव्यवाट्) प्राप्त होने योग्य वस्तुओं को धारण करनेवाले (घृतनिर्णिक्) जल और घी के शोधनेवाले (अग्निः) अग्नि के सदृश (स्वाहुतः) अच्छे प्रकार आदरपूर्वक पुकारे गये उस विद्वान् पुरुष की निरन्तर सेवा करो ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे साधन और उपसाधनों से उपकार में लाया गया अग्नि कार्य्यों को सिद्ध करता है, वैसे ही सेवा से संतुष्टता को प्राप्त किये विद्वान् लोग विद्या आदि की सिद्धि को सम्पादन करते हैं ॥५॥
Subject
विद्वान् लोग अग्नि के तुल्य कार्यसाधक होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।