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Rigveda Mandal 3 / Sukta 27 / Mantra 4

62 Sukta
15 Mantra
3/27/4
Devata- अग्निः Rishi- विश्वामित्रः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स॒मि॒ध्यमा॑नो अध्व॒रे॒३॒॑ग्निः पा॑व॒क ईड्यः॑। शो॒चिष्के॑श॒स्तमी॑महे॥

स॒म्ऽइ॒ध्यमा॑नः । अ॒ध्व॒रे । अ॒ग्निः । पा॒व॒कः । ईड्यः॑ । शो॒चिःऽके॑शः । तम् । ई॒म॒हे॒ ॥

Mantra without Swara
समिध्यमानो अध्वरे३ग्निः पावक ईड्यः। शोचिष्केशस्तमीमहे॥

सम्ऽइध्यमानः। अध्वरे। अग्निः। पावकः। ईड्यः। शोचिःऽकेशः। तम्। ईमहे॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 28 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (अध्वरे) अहिंसारूप यज्ञ में (समिध्यमानः) उत्तम रीति से प्रकाशमान (शोचिष्केशः) केशों के सदृश तेजों से युक्त (पावकः) पवित्र करनेवाला (अग्निः) बिजुली के सदृश (ईड्यः) स्तुति करने योग्य होवे (तम्) उसकी हम लोग (ईमहे) याचना करते हैं, आप लोग भी इसका सेवन करिये ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे इस संसार में अग्निरूप पदार्थ ही सम्पूर्ण पदार्थों से श्रेष्ठ है, इसलिये इस अग्निविषयिणी विद्या की प्रार्थना करनी योग्य है, वैसे ही विद्वान् लोग सम्पूर्ण मनुष्यों में श्रेष्ठ और उनकी विद्याप्राप्ति के लिये प्रार्थना करनी चाहिये ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।