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Rigveda Mandal 3 / Sukta 27 / Mantra 15

62 Sukta
15 Mantra
3/27/15
Devata- अग्निः Rishi- विश्वामित्रः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वृष॑णं त्वा व॒यं वृ॑ष॒न्वृष॑णः॒ समि॑धीमहि। अग्ने॒ दीद्य॑तं बृ॒हत्॥

वृष॑णम् । त्वा॒ । व॒यम् । वृ॒ष॒न् । वृष॑णः । सम् । इ॒धी॒म॒हि॒ । अग्ने॑ । दीद्य॑तम् । बृ॒हत् ॥

Mantra without Swara
वृषणं त्वा वयं वृषन्वृषणः समिधीमहि। अग्ने दीद्यतं बृहत्॥

वृषणम्। त्वा। वयम्। वृषन्। वृषणः। सम्। इधीमहि। अग्ने। दीद्यतम्। बृहत्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 30 Mantra » 5

Bhashya

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Meaning
हे (वृषन्) बलयुक्त (अग्ने) अग्नि के सदृश प्रकाशकर्त्ता जन ! जैसे आप (बृहत्) बड़े (दीद्यतम्) प्रकाशकर्त्ता विज्ञान को प्रकाशित करते हैं वैसे ही (वयम्) हम लोग (वृषणम्) सुखवृष्टिकारक (त्वा) आप और अन्य जनों को (वृषणः) बलयुक्त (सम्) उत्तम प्रकार (इधीमहि) प्रकाशित करें ॥१५॥
Essence
हे पढ़ाने और पढ़नेवाले पुरुषो ! आप लोगों को चाहिये कि विरोध को त्याग और प्रीति को उत्पन्न करके परस्पर की वृद्धि करो, जिससे विद्या आदि उत्तम गुणों के प्रकाश से सम्पूर्ण मनुष्य बलयुक्त और न्यायकारी होवें ॥१५॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त में कहे अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह सत्ताईसवाँ सूक्त और तीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर पढ़ने-पढ़ाने के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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