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Rigveda Mandal 3 / Sukta 27 / Mantra 12

62 Sukta
15 Mantra
3/27/12
Devata- अग्निः Rishi- विश्वामित्रः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ऊ॒र्जो नपा॑तमध्व॒रे दी॑दि॒वांस॒मुप॒ द्यवि॑। अ॒ग्निमी॑ळे क॒विक्र॑तुम्॥

ऊ॒र्जः । नपा॑तम् । अ॒ध्व॒रे । दी॒दि॒ऽवांस॑म् । उप॑ । द्यवि॑ । अ॒ग्निम् । ई॒ळे॒ । क॒विऽक्र॑तुम् ॥

Mantra without Swara
ऊर्जो नपातमध्वरे दीदिवांसमुप द्यवि। अग्निमीळे कविक्रतुम्॥

ऊर्जः। नपातम्। अध्वरे। दीदिऽवांसम्। उप। द्यवि। अग्निम्। ईळे। कविऽक्रतुम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 30 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जिसको (द्यवि) प्रकाश तथा (अध्वरे) मेल को प्राप्त संसार में (अग्निम्) अग्नि के सदृश तेजयुक्त (ऊर्जः) बल से (नपातम्) विनाशरहित (कविक्रतुम्) विद्वानों की बुद्धि वा कर्म को यज्ञ समझनेवाला (दीदिवांसम्) प्रकाशमान विद्वान् पुरुष के (उप) समीप (ईळे) स्तुति करता हूँ, वैसे इसकी आप लोग भी प्रशंसा करो ॥१२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे यज्ञ में अग्नि प्रकाशमान होकर शोभित होता है, वैसे ही विद्या के प्रकाशकर्त्ता व्यवहार में विद्वान् जन प्रकाशित होते हैं ॥१२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।