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Rigveda Mandal 3 / Sukta 26 / Mantra 5

62 Sukta
9 Mantra
3/26/5
Devata- मरूतः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ॒ग्नि॒श्रियो॑ म॒रुतो॑ वि॒श्वकृ॑ष्टय॒ आ त्वे॒षमु॒ग्रमव॑ ईमहे व॒यम्। ते स्वा॒निनो॑ रु॒द्रिया॑ व॒र्षनि॑र्णिजः सिं॒हा न हे॒षक्र॑तवः सु॒दान॑वः॥

अ॒ग्नि॒ऽश्रियः॑ । म॒रुतः॑ । वि॒श्वऽकृ॑ष्टयः । आ । त्वे॒षम् । उ॒ग्रम् । अवः॑ । ई॒म॒हे॒ । व॒यम् । ते । स्वा॒निनः॑ । रु॒द्रियाः॑ । व॒र्षऽनि॑र्निजः । सिं॒हाः । न । हे॒षऽक्र॑तवः । सु॒ऽदान॑वः ॥

Mantra without Swara
अग्निश्रियो मरुतो विश्वकृष्टय आ त्वेषमुग्रमव ईमहे वयम्। ते स्वानिनो रुद्रिया वर्षनिर्णिजः सिंहा न हेषक्रतवः सुदानवः॥

अग्निऽश्रियः। मरुतः। विश्वऽकृष्टयः। आ। त्वेषम्। उग्रम्। अवः। ईमहे। वयम्। ते। स्वानिनः। रुद्रियाः। वर्षऽनिर्निजः। सिंहाः। न। हेषऽक्रतवः। सुऽदानवः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 26 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (वयम्) हम लोग जो (विश्वकृष्टयः) सम्पूर्ण सृष्टि के उत्पन्नकर्त्ता (अग्निश्रियः) अग्नि से धनयुक्त (स्वानिनः) अतिशय शब्दों से विशिष्ट (रुद्रियाः) अग्नि में उत्पन्न होनेवाले (वर्षनिर्णिजः) सृष्टि के पवित्र करने वा पुष्ट करनेवाले (मरुतः) वायुदल (सिंहाः) व्याघ्रों के (न) सदृश शब्द करते जिनको (हेषक्रतवः) शब्दरूप बुद्धि वा क्रियावाले (सुदानवः) उत्तम दानकारक हम लोग (आ, ईमहे) अच्छे प्रकार याचना करते हैं (ते) वे सब प्रकार माँगने योग्य हैं, उनसे हम लोग (उग्रम्) कठिन (त्वेषम्) प्रकाश और कठिन (अवः) रक्षण आदि की याचना करते हैं ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि विद्वान् लोगों के सङ्ग से बुद्धिमान् होकर वायु आदि की सम्बन्धिनी पदार्थविद्या की प्रार्थना करें और सिंह के समान पराक्रम को धारण करें ॥५॥
Subject
फिर वायु आदि से क्या सिद्ध करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।