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Rigveda Mandal 3 / Sukta 26 / Mantra 4

62 Sukta
9 Mantra
3/26/4
Devata- मरूतः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
प्र य॑न्तु॒ वाजा॒स्तवि॑षीभिर॒ग्नयः॑ शु॒भे संमि॑श्लाः॒ पृष॑तीरयुक्षत। बृ॒ह॒दुक्षो॑ म॒रुतो॑ वि॒श्ववे॑दसः॒ प्र वे॑पयन्ति॒ पर्व॑ताँ॒ अदा॑भ्याः॥

प्र । य॒न्तु॒ । वाजाः॑ । तवि॑षीभिः । अ॒ग्नयः॑ । शु॒भे । सम्ऽमि॑श्लाः । पृष॑तीः । अ॒यु॒क्ष॒त॒ । बृ॒ह॒त्ऽउक्षः॑ । म॒रुतः॑ । वि॒श्वऽवे॑दसः । प्र । वे॒प॒य॒न्ति॒ । पर्व॑तान् । अदा॑भ्याः ॥

Mantra without Swara
प्र यन्तु वाजास्तविषीभिरग्नयः शुभे संमिश्लाः पृषतीरयुक्षत। बृहदुक्षो मरुतो विश्ववेदसः प्र वेपयन्ति पर्वताँ अदाभ्याः॥

प्र। यन्तु। वाजाः। तविषीभिः। अग्नयः। शुभे। सम्ऽमिश्लाः। पृषतीः। अयुक्षत। बृहत्ऽउक्षः। मरुतः। विश्वऽवेदसः। प्र। वेपयन्ति। पर्वतान्। अदाभ्याः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 26 Mantra » 4

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Meaning
हे वीरो ! आप लोग (तविषीभिः) पराक्रम आदिकों के साथ जैसे (वाजाः) वेगवाले (अग्नयः) अग्नि (विश्ववेदसः) संपूर्ण धनों से युक्त (बृहदुक्षः) अतिशय सेचनकारक (मरुतः) वायु (शुभे) जल में (संमिश्लाः) अच्छे प्रकार मिली हुई वा सुन्दर प्रयुक्त (पृषतीः) सेचन में कारण (प्र) (यन्तु) प्राप्त होवें और (अदाभ्याः) नहीं मारने योग्य होकर (पर्वतान्) पर्वतों के सदृश ऊँचे मेघों को (प्र) (वेपयन्ति) कंपाते हैं, वैसे आप लोग भी परस्पर मित्र होकर शत्रुओं को कंपाओ और बलयुक्त सेना का सञ्चय करो ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे जल में मिले हुए पृथिवी अग्नि वायु वर्त्तमान हैं, वैसे ही जो लोग सेना में मित्र होकर वर्त्तमान होते हैं, उनका निश्चय विजय होता है ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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