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Rigveda Mandal 3 / Sukta 25 / Mantra 5

62 Sukta
5 Mantra
3/25/5
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अग्ने॑ अ॒पां समि॑ध्यसे दुरो॒णे नित्यः॑ सूनो सहसो जातवेदः। स॒धस्था॑नि म॒हय॑मान ऊ॒ती॥

अग्ने॑ । अ॒पाम् । सम् । इ॒ध्य॒से॒ । दु॒रो॒णे । नित्यः॑ । सू॒नो॒ इति॑ । स॒ह॒सः॒ । जा॒त॒ऽवे॒दः॒ । स॒धऽस्था॑नि । म॒हय॑मानः । ऊ॒ती ॥

Mantra without Swara
अग्ने अपां समिध्यसे दुरोणे नित्यः सूनो सहसो जातवेदः। सधस्थानि महयमान ऊती॥

अग्ने। अपाम्। सम्। इध्यसे। दुरोणे। नित्यः। सूनो इति। सहसः। जातऽवेदः। सधऽस्थानि। महयमानः। ऊती॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 25 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सहसः) बलवान् के (सूनो) पुत्र के तुल्य वर्त्तमान वा अविद्या के नाशकारक (जातवेदः) सम्पूर्ण उत्पन्न पदार्थों के ज्ञाता (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्वी (नित्यः) अपने स्वरूप से नाशरहित (महयमानः) पूजने अर्थात् आदर करने योग्य ! जो आप (ऊती) रक्षण आदि क्रिया से (अपाम्) प्राणों के मध्य में सूर्य के सदृश (दुरोणे) रहने के स्थान गृह में (सम्) (इध्यसे) प्रकाशित होते उन आपको चाहिये कि सम्पूर्ण मनुष्यों के (सधस्थानि) तुल्य स्थानों और आत्माओं को विद्या धर्म्म विनय से प्रकाशित करें ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभावयुक्त और सच्चित् आनन्द आदि लक्षण विशिष्ट परमात्मा सम्पूर्ण जगत् को उत्पन्न और रक्षित कर आनन्दित करता है, वैसे ही सत्यवक्ता विद्वान् पुरुषों को चाहिये कि सम्पूर्ण इस संसार को आनन्दयुक्त करें ॥५॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह पच्चीसवाँ सूक्त और पच्चीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
विद्वानों को परमात्मा के तुल्य जगत् को आनन्दित करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।