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Rigveda Mandal 3 / Sukta 25 / Mantra 4

62 Sukta
5 Mantra
3/25/4
Devata- अग्निः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अग्ने॒ इन्द्र॑श्च दा॒शुषो॑ दुरो॒णे सु॒ताव॑तो य॒ज्ञमि॒होप॑ यातम्। अम॑र्धन्ता सोम॒पेया॑य देवा॥

अग्ने॑ । इन्द्रः॑ । च॒ । दा॒शुषः॑ । दु॒रो॒णे । सु॒तऽव॑तः । य॒ज्ञम् । इ॒ह । उप॑ । या॒त॒म् । अम॑र्धन्ता । सो॒म॒ऽपेया॑य । दे॒वा॒ ॥

Mantra without Swara
अग्ने इन्द्रश्च दाशुषो दुरोणे सुतावतो यज्ञमिहोप यातम्। अमर्धन्ता सोमपेयाय देवा॥

अग्ने। इन्द्रः। च। दाशुषः। दुरोणे। सुतऽवतः। यज्ञम्। इह। उप। यातम्। अमर्धन्ता। सोमऽपेयाय। देवा॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 25 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य विद्या से प्रकाशित विद्वान् पुरुष ! जैसे (अमर्धन्ता) सबको सुखाते हुए (देवा) श्रेष्ठ गुणों से युक्त पुरुष (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्यकारक बिजुली संबन्धी अग्नि (च) और पवन तथा (सोमपेयाय) ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये (सुतावतः) ऐश्वर्य से युक्त (दाशुषः) विद्यासम्बन्धी सुख के दाता (दुरोणे) गृह में (यज्ञम्) विद्वान् सत्कार आदि स्वरूप व्यवहार को (इह) इस संसार में (उप) (यातम्) प्राप्त हों और वैसे आप भी प्राप्त होइये और अध्यापक तथा उपदेशक भी प्राप्त हों ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जहाँ वायु और बिजुली के तुल्य वर्त्तमान अविद्या के विनाश और विद्या के प्रकाशकर्त्ता धर्म के उपदेशकर्त्ता अध्यापक और उपदेशक होवें, वहाँ संपूर्ण सुख बढ़े ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।