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Rigveda Mandal 3 / Sukta 25 / Mantra 2

62 Sukta
5 Mantra
3/25/2
Devata- अग्निः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अ॒ग्निः स॑नोति वी॒र्या॑णि वि॒द्वान्त्स॒नोति॒ वाज॑म॒मृता॑य॒ भूष॑न्। स नो॑ दे॒वाँ एह व॑हा पुरुक्षो॥

अ॒ग्निः । स॒नो॒ति॒ । वी॒र्या॑णि । वि॒द्वान् । स॒नोति॑ । वाज॑म् । अ॒मृता॑य । भूष॑न् । सः । नः॒ । दे॒वान् । आ । इ॒ह । व॒ह॒ । पु॒रु॒क्षो॒ इति॑ पुरुऽक्षो ॥

Mantra without Swara
अग्निः सनोति वीर्याणि विद्वान्त्सनोति वाजममृताय भूषन्। स नो देवाँ एह वहा पुरुक्षो॥

अग्निः। सनोति। वीर्याणि। विद्वान्। सनोति। वाजम्। अमृताय। भूषन्। सः। नः। देवान्। आ। इह। वह। पुरुक्षो इति पुरुऽक्षो॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 25 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (पुरुक्षो) अतिशय अन्न आदि से युक्त जो (विद्वान्) विद्यावान् पुरुष ! आप जैसे (अग्निः) अग्नि के सदृश (वीर्य्याणि) पराक्रमों का (सनोति) धारण करनेवाले वैसे (सः) वह (अमृताय) नाशरहित मोक्षसुख की प्राप्ति के लिये (नः) हम (देवान्) विद्वानों को (इह) इस संसार में (भूषन्) शोभित करते हुए (वाजम्) विज्ञान को (सनोति) देता है, उन प्रकाशित करनेवाले पुरुष को हम लोगों के लिये (आ) (वह) अच्छे प्रकार प्राप्त करो ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य आकारवाले पदार्थों को उत्तम प्रकार शोभित करता है, वैसे ही विद्वान् लोग विद्या उत्तम शिक्षा और सभ्यता से संपूर्ण मनुष्यों को शोभित करें ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।