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Rigveda Mandal 3 / Sukta 24 / Mantra 5

62 Sukta
5 Mantra
3/24/5
Devata- अग्निः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अग्ने॒ दा दा॒शुषे॑ र॒यिं वी॒रव॑न्तं॒ परी॑णसम्। शि॒शी॒हि नः॑ सूनु॒मतः॑॥

अग्ने॑ । दाः । दा॒शुषे॑ । र॒यिम् । वी॒रऽव॑न्तम् । परी॑णसम् । शि॒शी॒हि । नः॒ । सू॒नु॒ऽमतः॑ ॥

Mantra without Swara
अग्ने दा दाशुषे रयिं वीरवन्तं परीणसम्। शिशीहि नः सूनुमतः॥

अग्ने। दाः। दाशुषे। रयिम्। वीरऽवन्तम्। परीणसम्। शिशीहि। नः। सूनुऽमतः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 24 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजयुक्त विद्वान् पुरुष ! जैसे आप (दाशुषे) सबके सुखदाता जन के लिये (परीणसम्) बहुत प्रकारयुक्त (वीरवन्तम्) बहुत वीरों से विशिष्ट (रयिम्) धन को (दाः) दीजिये और वैसे ही (सूनुमतः) पुत्रयुक्त (नः) हम लोगों को (शिशीहि) प्रबल कीजिये ॥५॥
Essence
जो विद्या और धन के दाता विद्वान् हों, उनके प्रति ऐसा कहना चाहिये कि आप लोग हम लोगों की सब प्रकार वृद्धि करो ॥५॥ इस सूक्त में अग्नि, राजा और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥ यह चौबीसवाँ सूक्त और चौबीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
अब विद्वान् के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।