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Rigveda Mandal 3 / Sukta 24 / Mantra 2

62 Sukta
5 Mantra
3/24/2
Devata- अग्निः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अग्न॑ इ॒ळा समि॑ध्यसे वी॒तिहो॑त्रो॒ अम॑र्त्यः। जु॒षस्व॒ सू नो॑ अध्व॒रम्॥

अग्ने॑ । इ॒ळा । सम् । इ॒ध्य॒से॒ । वी॒तिऽहो॑त्रः । अम॑र्त्यः । जु॒षस्व॑ । सु । नः॒ । अ॒ध्व॒रम् ॥

Mantra without Swara
अग्न इळा समिध्यसे वीतिहोत्रो अमर्त्यः। जुषस्व सू नो अध्वरम्॥

अग्ने। इळा। सम्। इध्यसे। वीतिऽहोत्रः। अमर्त्यः। जुषस्व। सु। नः। अध्वरम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 24 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य विद्या के प्रकाश से युक्त पुरुष ! (अमर्त्यः) आत्मरूप से मरणधर्मरहित (वीतिहोत्रः) उत्तम गुणों से पूरित विद्याओं के स्वीकारकारी आप जो (इळा) उत्तम प्रकार शिक्षित स्तुति करने योग्य वाणी है और जिससे आप (सम्) (इध्यसे) उत्तम प्रकार प्रकाशित हो उसके साथ (नः) हम लोगों के (अध्वरम्) अहिंसा आदि व्यवहार से युक्त यज्ञ का (सु, जुषस्व) अच्छे प्रकार सेवन करो ॥२॥
Essence
विद्वानों को चाहिये कि जिससे अपनी वृद्धि हो, उसीसे अन्य जनों की उन्नति करें ॥२॥
Subject
अब विद्वानों को कैसे दूसरों की उन्नति करनी चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।