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Rigveda Mandal 3 / Sukta 21 / Mantra 5

62 Sukta
5 Mantra
3/21/5
Devata- अग्निः Rishi- गाथी कौशिकः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ओजि॑ष्ठं ते मध्य॒तो मेद॒ उद्भृ॑तं॒ प्र ते॑ व॒यं द॑दामहे। श्चोत॑न्ति ते वसो स्तो॒का अधि॑ त्व॒चि प्रति॒ तान्दे॑व॒शो वि॑हि॥

ओजि॑ष्ठम् । ते॒ । म॒ध्य॒तः । मेदः॑ । उत्ऽभृ॑तम् । प्र । ते॒ । व॒यम् । द॒दा॒म॒हे॒ । श्चोत॑न्ति । ते॒ । व्स् इति॑ । स्तो॒काः । अधि॑ । त्व॒चि । प्रति॑ । तान् । दे॒व॒ऽशः । वि॒हि॒ ॥

Mantra without Swara
ओजिष्ठं ते मध्यतो मेद उद्भृतं प्र ते वयं ददामहे। श्चोतन्ति ते वसो स्तोका अधि त्वचि प्रति तान्देवशो विहि॥

ओजिष्ठम्। ते। मध्यतः। मेदः। उत्ऽभृतम्। प्र। ते। वयम्। ददामहे। श्चोतन्ति। ते। वसो इति। स्तोकाः। अधि। त्वचि। प्रति। तान्। देवऽशः। विहि॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 21 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वसो) निवास के कारण ! (ते) आपके (मध्यतः) मध्य से जो (ओजिष्ठम्) अति बलयुक्त (मेदः) प्रीति (उद्भृतम्) उत्तम प्रकार धारण की गयी उनको (ते) आपके लिये (वयम्) हम लोग (प्र, ददामहे) देते हैं जो (स्तोकाः) स्तुतिकारक (ते) आपके (अधि) उपर (त्वचि) चर्म में (श्चोतन्ति) सिञ्चन करते हैं (तान्) उन (देवशः) विद्वानों के (प्रति) समीप (विहि) प्राप्त होइये ॥५॥
Essence
जो पुरुष बहुत ही उत्तम वस्तु जिस पुरुष को देवे, उस पुरुष को चाहिये कि उसे देनेवाले पुरुष को वैसी ही वस्तु देवे और जो लोग विद्वानों के सत्सङ्ग से श्रेष्ठ गुणों को प्राप्त होते हैं, वे संपूर्ण जनों को कोमल स्वभावयुक्त कर सकते हैं ॥५॥ इस सूक्त में अग्नि और मनुष्यों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥ यह इक्कीसवाँ सूक्त और इक्कीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।