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Rigveda Mandal 3 / Sukta 20 / Mantra 1

62 Sukta
5 Mantra
3/20/1
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- गाथी कौशिकः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒ग्निमु॒षस॑म॒श्विना॑ दधि॒क्रां व्यु॑ष्टिषु हवते॒ वह्नि॑रु॒क्थैः। सु॒ज्योति॑षो नः शृण्वन्तु दे॒वाः स॒जोष॑सो अध्व॒रं वा॑वशा॒नाः॥

अ॒ग्निम् । उ॒षस॑म् । अ॒श्विना॑ । द॒धि॒ऽक्राम् । विऽउ॑ष्टिषु । ह॒व॒ते॒ । वह्निः॑ । उ॒क्थैः । सु॒ऽज्योति॑षः । नः॒ । शृ॒ण्व॒न्तु॒ । दे॒वाः । स॒ऽजोष॑सः । अ॒ध्व॒रम् । वा॒व॒शा॒नाः ॥

Mantra without Swara
अग्निमुषसमश्विना दधिक्रां व्युष्टिषु हवते वह्निरुक्थैः। सुज्योतिषो नः शृण्वन्तु देवाः सजोषसो अध्वरं वावशानाः॥

अग्निम्। उषसम्। अश्विना। दधिऽक्राम्। विऽउष्टिषु। हवते। वह्निः। उक्थैः। सुऽज्योतिषः। नः। शृण्वन्तु। देवाः। सऽजोषसः। अध्वरम्। वावशानाः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 20 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे अध्यापक उपदेशक जनो ! जैसे (वह्निः) पदार्थों का धारणकर्त्ता (व्युष्टिषु) प्रकाशकारक क्रियाओं में (अग्निम्) अग्नि (उषसम्) प्रातःकाल (अश्विना) सूर्यचन्द्रमा और (दधिक्राम्) संसार के धारणकारकों के उल्लङ्घनकर्त्ता को (हवते) ग्रहण करता है वैसे (अध्वरम्) हिंसा भिन्न व्यवहार की (वावशानाः) अत्यन्त कामना करते हुए (सजोषसः) समान प्रीति के निर्वाहक (सुज्योतिषः) शोभन उत्तम बुद्धि के प्रकाशों से युक्त (देवाः) विद्वान् आप लोग (उक्थैः) प्रशंसा करने योग्य कर्मों से (नः) हम लोगों के प्रार्थनारूप वचन (शृण्वन्तु) सुनिये ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे वायु संपूर्ण प्रकाशकारी सूर्य आदि पदार्थों के धारण द्वारा सब जीवों का उपकार करता, वैसे विद्वान् पुरुष सम्पूर्ण जनों के साथ वैर छोड़नारूप अहिंसा धर्म के प्रचार के लिये एकसम्मति से सब संसार का उपकार करें ॥१॥
Subject
अब तृतीय मण्डल के बीसवें सूक्त का आरम्भ है। इसके प्रथम मन्त्र से विद्वान जन कैसे वर्त्तें, इस विषय को कहते हैं।