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Rigveda Mandal 3 / Sukta 2 / Mantra 5

62 Sukta
15 Mantra
3/2/5
Devata- अग्निर्वैश्वानरः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ॒ग्निं सु॒म्नाय॑ दधिरे पु॒रो जना॒ वाज॑श्रवसमि॒ह वृ॒क्तब॑र्हिषः। य॒तस्रु॑चः सु॒रुचं॑ वि॒श्वदे॑व्यं रु॒द्रं य॒ज्ञानां॒ साध॑दिष्टिम॒पसा॑म्॥

अ॒ग्निम् । सु॒म्नाय॑ । द॒धि॒रे॒ । पु॒रः । जनाः॑ । वाज॑ऽश्रवसम् । इ॒ह । वृ॒क्तऽब॑र्हिषः । य॒तऽस्रु॑चः । सु॒ऽरुच॑म् । वि॒श्वऽदे॑व्यम् । रु॒द्रम् । य॒ज्ञाना॑म् । साध॑त्ऽइष्टिम् । अ॒पसा॑म् ॥

Mantra without Swara
अग्निं सुम्नाय दधिरे पुरो जना वाजश्रवसमिह वृक्तबर्हिषः। यतस्रुचः सुरुचं विश्वदेव्यं रुद्रं यज्ञानां साधदिष्टिमपसाम्॥

अग्निम्। सुम्नाय। दधिरे। पुरः। जनाः। वाजऽश्रवसम्। इह। वृक्तऽबर्हिषः। यतऽस्रुचः। सुऽरुचम्। विश्वऽदेव्यम्। रुद्रम्। यज्ञानाम्। साधत्ऽइष्टिम्। अपसाम्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 17 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (यतस्रुचः) जिन्होंने यज्ञ करने की स्रुचा ग्रहण किई और (वृक्तबर्हिषः) यज्ञ धूम से अन्तरिक्ष छेदन किया वे (जनाः) ऋत्विज् मनुष्य (इह) वर्तमान समय में (सुम्नाय) सुख के लिये (सुरुचम्) सुन्दर प्रकाशित (विश्वदेव्यम्) समस्त दिव्य पदार्थों में उत्पन्न हुए (रुद्रम्) किन्हीं को रुलानेवाले (यज्ञानाम्) यज्ञ कर्मों के (साधदिष्टिम्) हवन कर्म को जिससे सिद्ध करते वा अन्य (अपसाम्) कर्मों के बीच (वाजश्रवसम्) वेग और अन्न को सिद्ध करते उस (अग्निम्) अग्नि को (पुरः) प्रथम सब कर्मों से पहिले (दधिरे) धारण करते हैं वैसे हम लोगों को भी अनुष्ठान करना चाहिये ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे ऋत्विग्जन यज्ञों में अग्नि से वायु और वर्षा के जल की शुद्धि आदि काम करते हैं, वैसे शिल्पि आदि जनों को भी पाचक अग्नि से कार्य सिद्ध करने चाहिये ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।