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Rigveda Mandal 3 / Sukta 2 / Mantra 4

62 Sukta
15 Mantra
3/2/4
Devata- अग्निर्वैश्वानरः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
आ म॒न्द्रस्य॑ सनि॒ष्यन्तो॒ वरे॑ण्यं वृणी॒महे॒ अह्र॑यं॒ वाज॑मृ॒ग्मिय॑म्। रा॒तिं भृगू॑णामु॒शिजं॑ क॒विक्र॑तुम॒ग्निं राज॑न्तं दि॒व्येन॑ शो॒चिषा॑॥

आ । म॒न्द्रस्य॑ । स॒नि॒ष्यन्तः॑ । वरे॑ण्यम् । वृ॒णी॒महे॑ । अह्र॑यम् । वाज॑म् । ऋ॒ग्मिय॑म् । रा॒तिम् । भृगू॑णाम् । उ॒शिज॑म् । क॒विऽक्र॑तुम् । अ॒ग्निम् । राज॑न्तम् । दि॒व्येन॑ । शो॒चिषा॑ ॥

Mantra without Swara
आ मन्द्रस्य सनिष्यन्तो वरेण्यं वृणीमहे अह्रयं वाजमृग्मियम्। रातिं भृगूणामुशिजं कविक्रतुमग्निं राजन्तं दिव्येन शोचिषा॥

आ। मन्द्रस्य। सनिष्यन्तः। वरेण्यम्। वृणीमहे। अह्रयम्। वाजम्। ऋग्मियम्। रातिम्। भृगूणाम्। उशिजम्। कविऽक्रतुम्। अग्निम्। राजन्तम्। दिव्येन। शोचिषा॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 17 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे जिस (मन्द्रस्य) अच्छे प्रकार आनन्द देनेवाले के लाभ के लिये (अह्रयम्) लज्जारहित (वाजम्) वेगवान् (ऋग्मियम्) ऋचाओं से जिसका प्रक्षेप होता अर्थात् जिस में क्रिया होती उस (भृगूणाम्) अविद्या जलानेवालों के (रातिम्) देनेवाले (उशिजम्) मनोहर (दिव्येन) शुद्ध और (शोचिषा) स्वरूप से (राजन्तम्) प्रकाशमान (कविक्रतुम्) कवियों के यज्ञ के समान उपकार जिसका उस (वरेण्यम्) स्वीकार करने योग्य (अग्निम्) अग्नि को (सनिष्यन्तः) बाँटते हुए हम लोग (आ, वृणीमहे) अच्छे प्रकार स्वीकार करते हैं वैसे तुम भी उसको स्वीकार करो ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो युक्ति से अग्नि को सेवन करें, तो क्या-क्या दिव्य सुख वा वस्तु न सिद्ध करें ? ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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